श्रीमद् भागवत कथा: प्रेम का सागर उड़ेला गया
*त्रिभुवन दास जी महाराज ने कहा – प्रेम में स्वसुख नही अपितु प्रियतम को सुख पहुंचाना ही प्रेमास्पद का मूल भाव*
जितेन्द्र पाठक
संतकबीरनगर – भिटहा स्थित “चतुर्वेदी विला” में चल रही नौ दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के सातवें दिन कथा व्यास त्रिभुवन दास जी महाराज ने रुक्मिणी विवाह के बाद श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियों के विरह की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि प्रेम में स्वसुख की अपेक्षा नहीं होती, प्रियतम को सुख पहुंचाना ही प्रेमास्पद का मूल भाव है।
*कथा के मुख्य बिंदु:*
– भगवान श्रीकृष्ण ने 16 हजार एक सौ आठ कन्याओं से विवाह किया, जो वेद ऋचाओं की व्याख्या है।
– वेद में तीन कांड और एक लाख मन्त्र हैं, जो ब्रह्मचारियों, गृहस्थों और बानप्रस्थ के लिए नियत हैं।
– गोपियों का प्रेम भगवान के प्रति निश्चल है, जो उद्धव जी को भी आकर्षित करता है।
*अभिनंदन और आशीर्वाद:*
कथा व्यास त्रिभुवन दास जी महाराज ने मुख्य यजमान चंद्रावती देवी के नेतृत्व में जनार्दन चतुर्वेदी, जय चौबे, डा उदय प्रताप चतुर्वेदी, राकेश चतुर्वेदी, रत्नेश चतुर्वेदी, डा सत्यम, दिवयेश और रजत को आशीर्वाद दिया।
*कथा में उपस्थित लोग:*
सविता चतुर्वेदी, शिखा चतुर्वेदी, जिला पंचायत अध्यक्ष बलिराम यादव, पूर्व विधान सभा प्रत्याशी नीलमणि, पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष बद्री प्रसाद यादव, महामंत्री गणेश पांडेय, निहाल चंद्र पांडेय, वेद प्रकाश पांडेय, पवन पांडेय, ब्रह्म शंकर भारती, मनोज कुमार पांडेय, मायाराम पाठक, दिग्विजय यादव, जय प्रकाश यादव सहित सैकड़ों श्रोता मौजूद रहे।