भाव संपन्न काव्य यात्रा है ‘जब तक है जिंदगी

भाव संपन्न काव्य यात्रा है ‘जब तक है जिंदगी’

 

सुधीर श्रीवास्तव का कविता–संग्रह ”जब तक है जिंदगी” मानवीय संवेदनाओं, जीवन-दर्शन और सामाजिक अनुभूतियों का समृद्ध दस्तावेज़ है। कवि ने सरल भाषा, सहज भाव और गहन अंतर्मन के साथ जीवन के अनेक पक्षों को पाठकों के सामने अत्यंत मार्मिक रूप में रखा है। यह पुस्तक उन पलों को शब्द देती है, जिन्हें मन तो महसूस करता है, पर व्यक्त नहीं कर पाता।

 

संग्रह की आरंभिक कविताएँ जीवन के मूल प्रश्नों से पाठक का साक्षात्कार कराती हैं। “जिंदगी कैसी पहेली है” कविता में कवि जीवन की अनिश्चितता और बदलते रंगों को अत्यंत सटीकता से व्यक्त करते हुए लिखते हैं—

“जिंदगी कदम कदम पर अपने रंग दिखाती है…

जिंदगी अपनी ही चाल चलती है।”

यह पंक्तियाँ जीवन की जटिलता को सरलतम शब्दों में उजागर करती हैं।

 

आध्यात्मिक आयाम पर लिखी कविता “गीता ज्ञान” मनुष्य के व्यवहार, संयम और आत्ममंथन की ओर संकेत करती है। कृष्ण उपदेशों को आधुनिक जीवन से जोड़ते हुए कवि कहते हैं—

“आनंद मनुष्य के भीतर होता है

पर मनुष्य उसे बाहर ढूँढता है।”

यह संदेश आज की भागदौड़ वाली जीवनशैली में विशेष प्रासंगिक प्रतीत होता है।

 

समाज और परिवार की संवेदनाओं को स्पर्श करती कविता “बुजुर्गों की सेवा का पुण्य” पाठकों को करुणा और नैतिक कर्तव्य की याद दिलाती है—

“हमारे बुजुर्गों में ईश्वर बसता है

इसलिए बुजुर्गों की सेवा कर

ईश्वर कृपा प्राप्त कर लीजिए।”

यह सरल परंतु प्रेरक पंक्तियाँ पाठक के भीतर आत्मचिंतन जगाती हैं।

 

रिश्तों की कोमलता और भावनाओं की गहराई संग्रह की एक और प्रमुख विशेषता है। “दुआएँ दे रहा हूँ” कविता में कवि हृदयस्पर्शी सुरों में लिखते हैं—

“तुम्हारे दर्द भरे प्यार…

उससे मिलने का आत्मविश्वास था।”

यह कविता भावनात्मक सघनता और आत्मीयता की पराकाष्ठा का अनुभव कराती है।

 

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना पर आधारित कविता “सनातन की आवाज बनना है” अपने मूल्यों की रक्षा और परंपरा के सम्मान का संदेश देती है। कवि के शब्द—

“हम सनातनी हैं यारों, अकेले ही सब पर भारी हैं…

सनातन का झंडा बुलंद रखना हमारी जिम्मेदारी है।”

—सांस्कृतिक श्रद्धा और आत्मगौरव को दृढ़ता से व्यक्त करते हैं।

 

प्रस्तुत संग्रह भाषा की सरलता, भावों की प्रमाणिकता और विषयों की विविधता पाठक को निरंतर जोड़े रखती है। कवि कहीं जीवन के सत्य को छूते हैं, कहीं रिश्तों की ऊष्मा को, और कहीं सामाजिक विडंबनाओं को—पर हर स्थान पर उनका शब्द स्वाभाविक, सच्चा और आत्मिक है।

 

“जब तक है जिंदगी” केवल कविता-संग्रह नहीं, बल्कि अनुभवों का वह दर्पण है, जिसमें पाठक अपने जीवन, अपने संघर्ष और अपनी भावनाओं को स्पष्ट देखते हैं। यह कृति संवेदनशील पाठकों के लिए उतनी ही मूल्यवान है जितनी कविता–प्रेमियों के लिए—क्योंकि यह हृदय को छूकर भीतर तक उतर जाने वाली सहज, सत्य और मानवीय अभिव्यक्ति है।

मेरी ओर से सुधीर श्रीवास्तव जी को पुस्तक के लिए भूरि- भूरि प्रशंसा के साथ साथ अनंत बधाई और आकाश भर दुआएँ ।

 

डॉ अमित कुमार” बिजनौरी”

(संस्थापक- नव साहित्य परिवार भारत)

(संपादक – नव साहित्य मासिक ई पत्रिका)

कदराबाद खुर्द, स्योहारा

जिला -बिजनौर उत्तर प्रदेश