गणगौर का अनोखा रंग

काव्य: “गणगौर का अनोखा रंग”

फागुन की बयार में महकी सी बहार आई,

गणगौर की छटा ने हर गली सजाई।

मिट्टी की मूरत में जीवन मुस्कुराया,

श्रद्धा ने प्रेम का दीप फिर जलाया।

गौरी के संग शिव का पावन मिलन,

हर सुहागिन के मन में बसा यह सपन।

रंग-बिरंगी चूनर, हाथों में मेहंदी,

गीतों में झूमी हर सखी अनोखी।

कुंवारी कन्याओं की आँखों में आस,

मिले साजन ऐसा, जो हो सबसे खास।

नदी किनारे गूँजे मंगल के गीत,

हर दिल में बसता है श्रद्धा का मीत।

घड़े में सजे फूल, मन में उजियारा,

गौरी का रूप लगे सबसे प्यारा।

ढोलक की थाप पर थिरके अरमान,

हर कदम पे खिल उठे जीवन के गान।

सादगी में छिपा है प्रेम का श्रृंगार,

गणगौर सिखाए स्नेह का विस्तार।

परंपरा की डोर से बंधा यह त्योहार,

हर हृदय में जगाए विश्वास अपार।

 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़