कविता: “गौरैया की पुकार”
छोटी सी चिड़िया, प्यारी सी गौरैया,
आँगन में गूंजे उसकी मधुर मुरैया।
फुदक-फुदक कर दाने चुनती,
हर पल अपनी दुनिया बुनती।
कभी छज्जे पर, कभी पेड़ की डाली,
उसकी चहक से महके हरियाली।
नन्हे पंखों में साहस समाया,
छोटा सा तन, बड़ा हौसला लाया।
सुबह-सुबह वो गीत सुनाती,
नींद से सबको धीरे जगाती।
गर्मी, सर्दी, हर मौसम सहती,
फिर भी मुस्काकर जीवन कहती।
अब वो कम दिखती है घर-आँगन में,
खो गई जैसे शहर के जीवन में।
कटते पेड़, बढ़ती इमारतें,
छीन रहीं उसकी सारी राहतें।
आओ मिलकर उसे बुलाएँ,
फिर से अपना घर सजाएँ।
दाना-पानी रोज़ रखें,
गौरैया को फिर से बसने दें।
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़