संस्मरण
मेरी साहित्यिक यात्रा
सेवानिवृत्ति से पूर्व
*********
इस बात को तो मैं अपना परम सौभाग्य ही समझूँगा कि मैं अपने सर्वप्रथम साहित्यिक गुरु, मार्गदर्शक, आध्यात्मिक प्रेरणा स्रोत के रूप में अपने परम पूज्य पिता स्वर्गीय श्री राम शंकर सिंह ‘विभु’ जी को पाया । जो उत्तर प्रदेश हरदोई जनपद के एक छोटे से गांव पड़री में जन्मे वरिष्ठ कवि थे। जिनकी दो पुस्तकें अभी हाल में ही ‘गुरु का आशीर्वाद’ और ‘अनागत अभिलाषा’ मेरे द्वारा ही संपादित की गई हैं।
वैसे तो मैं अपने आप को बाल कवि नहीं कह सकता लेकिन यह कहने में कोई संकोच अथवा अतिशयोक्ति भी नहीं है कि विद्यार्थी जीवन से ही पूज्य पिता से प्रेरित होकर कविताएँ लिखने लगा था । और यथा समय रचनाएं प्रकाशित भी हुई । जैसे “भारत महिमा” कविता ’समय दूत’ और ’हरदोई समाचार’नामक समाचार पत्र में।
“बापू की मृदु स्मृति” शीर्षक से “जय गांधी” काव्य संकलन सहयोगी साहित्यकार प्रकाशन हरदोई से, इसके संपादक डॉ रोहिताश अस्थाना जी थे। विद्यार्थी जीवन में ही “मुग्धा” नामक पुस्तक का संपादक रहा।
ईश्वर की असीम कृपा से मेरे जीवन में अचानक मोड़ आया मेरे अंदर निहित राष्ट्रीय भावनाओं को मूर्त रूप देने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ। जब 1984 में सेना में राइफलमैन( सिपाही ) के रूप में भर्ती हो गया । राष्ट्र धर्म , राष्ट्र सुरक्षा की गति का पहिया जितना ही तीव्र गति से गतिमान हुआ, साहित्यिक यात्रा की गति का पहिया उतना ही मंद हो गया। तथापि सेवा के दौरान कभी फुर्सत के क्षण मिल जाते, उसमें साहित्यिक भावना को जागृत रखा।
तब ऐसे समय में कुछ लेखन भी हो जाता था। जैसे हमारे ट्रेनिंग सेंटर राजपूताना राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर दिल्ली से प्रकाशित ‘राजपूताना जर्नल 1998’ में ‘सच्चा सैनिक धर्म’ नामक रचना प्रकाशित हुई।जब भी किसी विषय पर पलटन में कविताओं की आवश्यकता होती तो कमान अधिकारी साहब या उनकी मेम साहब हमसे कविताएं लिखवाया करते थे।
कारगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन पराक्रम देश में चल रहा था उस हालात में समयचक्रानुसार 12 इन्फैंट्री डिवीजन पहुंच गया । कुछ राहत के क्षण मिलने से पर मैंने कई कविताएं लिखीं, जो आज भी सुरक्षित हैं । जिनमें से एक कविता मैंने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने वाली ‘ऑपरेशन पराक्रम’ लिखी, जो क्रमानुसार अधिकारी कार्यालयों से पास होती हुई जनरल आफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल के. एस .जमवाल -अति विशिष्ट सेना मेडल, विशिष्ट सेना मेडल बार, तक पहुँच गई ।
जिन्होंने मुझे 500 मुद्राएँ देकर अपने ऑफिस में सम्मानित किया । और कविता को अपने कार्यालय में बड़े बोर्ड पर लिखवा कर टंगवाया, जिसको पूरे डिवीजन की सेना पढ़ती थी। यह सम्मान मेरे लिए भारत रत्न से कम नहीं था। अब तो मेरा मनोबल सातवें आसमान पर था। मैंने पुनः कारगिल युद्ध के पश्चात एक कविता लिखी जो राजपूताना राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर दिल्ली धौला कुआं से प्रकाशित वार्षिक पत्रिका ‘वसुंधरा जर्नल 2002’ में ‘राज रिफ के वीर जवानों’ प्रकाशित हुई । जिसमें कारगिल में शहीद हमारे कंपनी टु आई सी कैप्टन हनीफुद्दीन ‘वीर चक्र’ एवं हमारे सीनियर साथी सूबेदार मंगेज सिंह ‘वीर चक्र’ तथा प्रवेश कुमार का नाम वर्णित था।
सैन्य सेवा के दौरान ही संयुक्त राष्ट्र संघ के तहत दक्षिण अफ्रीका ’सूडान’ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । वहाँ भी साहित्य से अछूता नहीं रहा, वहाँ से इन्फेंट्री बटालियन ग्रुप 5 से प्रकाशित ‘सूडान डाइजेस्ट’ पत्रिका में “यू एन के शांति दूत” नामक रचना प्रकाशित हुई । यह प्रकाशन होने के बाद मेरा मनोबल बढ़ता ही रहा। अब मैने ‘दी प्लाटून कमांडर पी सी विंग 2011’ के लिए संस्मरण लिख डाला, ‘व्यक्तिगत अनुभव: एक संस्मरण’ जो अक्षरशः प्रकाशित हुआ।
इस बड़ी उपलब्धि पर हमारी बटालियन के तत्कालीन सी ओ साहब कर्नल अनुज उपाध्याय (अब ब्रिगेडियर ) ने मुझे बटालियन में सम्मानित किया। उस समय तक मैं एक सैल्यूट अधिकारी (नायब सूबेदार) बन चुका था।
2014 में मैं सेवानिवृत हो गया था।
अब सब मुझे कैप्टन सरोज सिंह ‘सैनिक’ के नाम से जानते हैं।
कारगिल युद्ध के दौरान ऑपरेशन पराक्रम देश में चल रहा था उस हालात में समयचक्रानुसार 12 इन्फैंट्री डिवीजन पहुंच गया । कुछ राहत के क्षण मिलने से पर मैंने कई कविताएं लिखीं, जो आज भी सुरक्षित हैं । जिनमें से एक कविता मैंने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने वाली ‘ऑपरेशन पराक्रम’ लिखी, जो क्रमानुसार अधिकारी कार्यालयों से पास होती हुई जनरल आफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल के. एस .जमवाल -अति विशिष्ट सेना मेडल, विशिष्ट सेना मेडल बार, तक पहुँच गई ।
जिन्होंने मुझे 500 मुद्राएँ देकर अपने ऑफिस में सम्मानित किया । और कविता को अपने कार्यालय में बड़े बोर्ड पर लिखवा कर टंगवाया, जिसको पूरे डिवीजन की सेना पढ़ती थी।
यह सम्मान मेरे लिए भारत रत्न से कम नहीं था। अब तो मेरा मनोबल सातवें आसमान पर था। मैंने पुनः कारगिल युद्ध के पश्चात एक कविता लिखी जो राजपूताना राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर दिल्ली धौला कुआं से प्रकाशित वार्षिक पत्रिका ‘वसुंधरा जर्नल 2002’ में ‘राज रिफ के वीर जवानों’ प्रकाशित हुई । जिसमें कारगिल में शहीद हमारे कंपनी टु आई सी कैप्टन हनीफुद्दीन ‘वीर चक्र’ एवं हमारे सीनियर साथी सूबेदार मंगेज सिंह ‘वीर चक्र’ तथा प्रवेश कुमार का नाम वर्णित था।
सैन्य सेवा के दौरान ही संयुक्त राष्ट्र संघ के तहत दक्षिण अफ्रीका ’सूडान’ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । वहाँ भी साहित्य से अछूता नहीं रहा, वहाँ से इन्फेंट्री बटालियन ग्रुप 5 से प्रकाशित ‘सूडान डाइजेस्ट’ पत्रिका में “यू एन के शांति दूत” नामक रचना प्रकाशित हुई । यह प्रकाशन होने के बाद मेरा मनोबल बढ़ता ही रहा। अब मैने ‘दी प्लाटून कमांडर पी सी विंग 2011’ के लिए संस्मरण लिख डाला, ‘व्यक्तिगत अनुभव: एक संस्मरण’ जो अक्षरशः प्रकाशित हुआ।
इस बड़ी उपलब्धि पर हमारी बटालियन के तत्कालीन सी ओ साहब कर्नल अनुज उपाध्याय (अब ब्रिगेडियर ) ने मुझे बटालियन में सम्मानित किया। उस समय तक मैं एक सैल्यूट अधिकारी (नायब सूबेदार) बन चुका था।
2014 में मैं सेवानिवृत हो गया था।
अब सब मुझे कैप्टन सरोज सिंह ‘सैनिक’ के नाम से जानते हैं।
सेवानिवृत्ति के पश्चात
************
साहित्यिक दृष्टि से सेवानिवृत्ति के पश्चात पैतृक विरासत के रूप में उत्तर प्रदेश की लोकप्रिय हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य साधना’ से जुड़ा। जिसमें हमारे पूज्य पिता स्वर्गीय श्री राम शंकर सिंह “विभु” पहले से ही जुड़े हुए थे । इस पुस्तक में मैंने सर्वप्रथम आत्मकथा लिखी, जो पत्रिका में सर्वाधिक पृष्ठों की थी। इस पत्रिका का मुझे लखनऊ जनपद का संपादक नियुक्त कर दिया गया । जिसके हर अंक में मेरा एक लेख नियमित प्रकाशित होता है।इसी के वार्षिक कवि सम्मेलन में मेरी मुलाकात डा रामराज “भारती” जी से हुई । इन्हीं के माध्यम से मैं अखिल भारतीय अनागत साहित्य संस्थान के संस्थापक डॉ अजय प्रसून की त्रिवेणी नगर कवि गोष्ठी में जाने लगा। साथी प्रवीण कुमार पाण्डेय ‘आवारा’ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय अनागत साहित्य संस्थान एवं साहित्य की दुनिया में सम्मिलित हो गया और प्रत्येक मासिक गोष्ठी में काव्य पाठ करने लगा । इन्हीं दिनों श्री राम शंकर सिंह “विभु” जी की प्रथम पुस्तक “गुरु का आशीर्वाद” का संपादन मेरे द्वारा हुआ।
यत्र तत्र मेरी साहित्यिक दुनिया में गूँज बढ़ती गई। ‘विभु’ जी के स्वर्गवास के पश्चात उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप उनकी सभी रचनाओं को मैंने एक पुस्तक का रूप दिया। जिसका नाम “अनागत अभिलाषा” डॉ. अजय प्रसून एवं डॉ रामराज भारती की सहमति के आधार पर रखा गया। संपादन कार्य मैंने स्वयं किया । जिसका लोकार्पण 18 जनवरी 2025 को अखिल भारतीय अनागत साहित्य संस्थान के वार्षिक सम्मेलन में हुआ।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पुस्तक मेला में कवि सम्मेलन के शुभ अवसर पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर एवं रायबरेली काव्य रस साहित्य मंच समूह भारत के संस्थापक डॉक्टर शिवनाथ सिंह ‘शिव से मंच पर मुलाकात हुई, जो उस कवि सम्मेलन के मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे और मैं विशिष्ट अतिथि के रूप में।
वहीं से मेरी साहित्यिक यात्रा के में पंख लग गए। जिसका श्रेय मैं आ. दादा शिवनाथ सिंह “शिव” जी एवं अनुज यमराज मित्र सुधीर श्रीवास्तव गोणडा और अनुज डॉ. शिवकुमार सिंह रायबरेली को देता हूँ।
और अब तक…..
इसी के साथ आप सभी वरिष्ठ एवं कनिष्ठ साहित्यकार बन्धुओं एवं साहित्य प्रेमियों को
सादर नमन बंधन। जय हिंद जय भारत।
कविराज कैप्टन सरोज सिंह ‘सैनिक’
कैप्टन चौराहा, लखनऊ।