ब्रज की भक्ति-साधना में रची-बसी शक्ति की प्राचीन धरोहर – डॉ. शुभदा पांडेय

ब्रज की भक्ति-साधना में रची-बसी शक्ति की प्राचीन धरोहर

– डॉ. शुभदा पांडेय

(वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद्)

 

जितेन्द्र पाठक

 

संतकबीरनगर ब्रज मंडल संपूर्ण विश्व में कृष्ण-भक्ति साधना के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित है, क्योंकि यहाँ साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा विद्यमान है। दुनिया भर से श्रद्धालु इसी पावन भूमि के दर्शन की लालसा लेकर वर्ष भर मथुरा-वृंदावन आते हैं, लेकिन यहाँ की एक अनूठी विशेषता यह है कि इस भूमि पर प्रवेश करते ही “राधे-राधे” का दिव्य नाद आरंभ हो जाता है। मार्ग से लेकर मंदिर तक, वंशीवट की कुंजों से लेकर ललित कलाओं तक और यमुना के पावन तट से लेकर जन्मभूमि की प्राचीर तक, चतुर्दिक केवल श्री राधारानी का ही महिमामंडन सुनाई देता है। यह संपूर्ण क्षेत्र वास्तव में आद्यशक्ति की उपासना पर अडिग आस्था और विश्वास रखता है, जहाँ भक्ति और शक्ति का एक अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है।

ब्रजभूमि मूल रूप से राधा-कृष्ण के प्रेम और अनन्य भक्ति का आधार मानी जाती है, किंतु इसी भूमि की आध्यात्मिक विरासत में शक्ति-निष्ठा की एक अत्यंत गहरी और प्राचीन परंपरा का निर्वहन युगों-युगों से देखा जा सकता है। यहाँ भक्ति के मधुर स्वर में शक्ति उपासना की अनमोल धरोहर भी विराजमान है। नवरात्र के आगमन के साथ ही यहाँ के देवी मंदिरों में भक्तों की जो अटूट निष्ठा दिखाई देती है, वह देखते ही बनती है। घर-घर में होने वाली घट-स्थापना इस सत्य का प्रमाण है कि ब्रज की सांस्कृतिक चेतना आज भी पूरी तरह जाग्रत है, जहाँ शीलता, शौर्य और समता को एक साथ साकार किया जाता है। ब्रज की परंपरा में देवी केवल युद्ध-विजयिनी या शत्रुओं का नाश करने वाली शक्ति मात्र नहीं हैं, बल्कि उन्हें कुलदेवी, ग्रामदेवी और जीवन-संरक्षिका के ममतामयी रूप में देखा जाता है। यहाँ पथवारी देवी और शीतला माता की पूजा पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जिनका वर्णन ब्रज के लोकगीतों, पौराणिक कथाओं और मांगलिक अवसरों पर प्रमुखता से मिलता है।

ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से छटीकरा का प्रसिद्ध दुर्गाधाम यहाँ अत्यंत लोकप्रिय है। वहीं मथुरा में स्थित महाविद्या देवी मंदिर के प्रति जन-जन की अटूट आस्था जुड़ी है। सुख, समृद्धि और विद्या की अधिष्ठात्री इस माँ की स्थापना कृष्णकालीन मानी जाती है। यह नंद बाबा और वासुदेव जी की कुलदेवी हैं, जहाँ भगवान कृष्ण और बलराम का मुंडन संस्कार संपन्न हुआ था। पांडवों के अज्ञातवास की गाथाएं भी इस पावन स्थल से जुड़ी हुई हैं। इस मंदिर की महत्ता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका जीर्णोद्धार स्वयं छत्रपति शिवाजी महाराज ने करवाया था। इसी प्रकार, ब्रज में स्थित सिद्धपीठ कात्यायनी देवी का मंदिर भी श्रद्धा का केंद्र है, जिसकी गणना 51 शक्तिपीठों में की जाती है। श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित माँ कात्यायनी का वह मंत्र आज भी युवक-युवतियों के लिए सुयोग्य जीवनसाथी की कामना पूर्ण करने वाला माना जाता है।

आस्था का यह विस्तार आगरा के इंद्रपुरी क्षेत्र में सतोगुणी माँ के विख्यात मंदिर से लेकर बेसवाँ के पूठा देवी मंदिर तक फैला हुआ है, जो प्रत्येक सोमवार को दीपों के प्रकाश से जगमगा उठता है। ब्रज और आसपास के श्रद्धालुओं में राजस्थान की कैला देवी के प्रति भी अनन्य श्रद्धा है। लोग हाथों में ध्वजा लिए, नंगे पैर और टोलियों में गाते-बजाते हफ्तों की लंबी पदयात्रा पर निकल पड़ते हैं, जहाँ सेवा और समर्पण का भाव देखते ही बनता है। वास्तव में, “रूपं देहि जयं देहि यशो देहि” की आकांक्षा रखने वाले और माँ का अभिवंदन करने वाले साधकों का माँ चतुर्मुखी विकास करती हैं। नवरात्र के इस पुनीत अवसर पर यही कामना है कि माँ की कृपा से सबका मंगल और कल्याण हो।