ईद के मौके पर
करना नहीं था फिर भी वही कर रहे हैं हम,
कोई सबब नही है मगर मर रहे हैं हम।
पहरा बिठाये बैठा है राहों में वो मगर,
फिर भी ख़ुदा का शुक्र सफ़र कर रहे हैं हम।
इमान सर्द हो गया शायद इसीलिये,
डरना था उस कमीन को और डर रहे हैं हम।
ऐ-मादर-ऐ-वतन तुझे है इल्म ख़ूबतर,
दुश्मन के तेरे सीने में खंजर रहे हैं हम।
इक घूँट की तलब लिए फिरते हैं दरबदर,
इक दौर वो भी था कि समुंदर रहें हैं हम।
दुश्मन की भीड़ में तू निहत्था था जिस घड़ी,
उस वक्त तेरे हाथों का पत्थर रहे हैं हम।
इतरा रहा है आज तू कुर्सी पे बैठ कर,
वो दौर याद कर तेरे अफ़सर रहें हैं हम।
किस को दिखा रहा है तू दस्तार की हनक,
कम्बख़्त भूल मत के सिकंदर रहें हैं हम।
माना की आज कोई भी रक़बत नहीं नदीम,
लेकिन तेरे ख्यालों में अक्सर रहे हैं हम।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥