🐂🐂 ओ३म् 🐂🐂
*ज्ञानकुंभ स्नान कक्षा-१६*
कल हमने ब्रह्मांड के पंचम तत्व *ईश्वर* पर चिंतन किया था कि किसी वस्तु के न दिखने के पीछे *सात कारण* हैं।पुन: ईश्वर के न दिखने के पीछे दो कारण *मुख्य* बताये थे।
*(१)* ज्ञान की दूरी यानि अविद्या के कारण ज्ञान की दूरी बनी है।
(*२)* मल ,विक्षेप,आवरण के कारण नहीं दिखता।
🪷 *अटल समाधान*🪷
समाधान में बताया कि ज्ञान से *मल* निष्काम कर्म से *विक्षेप* व विशुद्ध उपासना से *आवरण* नष्ट होकर ईश्वर की अनुभूति अपने भीतर हृदय गुहा में ही हो जाती है *महाकुंभ स्नान* से कभी ईश्वर साक्षात्कार नहीं होता! यदि होता तो फिर *माता-पिता-आचार्य और स्कूल,कालेज,विश्वविद्यालय व वाटसप गुरुकुल महाविद्यालय* चलाने की आवश्यकता नहीं रहती।गतांक से आगे………………….
✍️ ✍️यक्ष प्रश्न ✍️✍️
*तर्क से आपने ईश्वर की सिद्धि कर दी है मगर फिर भी विश्वास क्यों नहीं होता?*
🏵️ यथार्थ उत्तर 🏵️
ईश्वर की सिद्धि जब भी होगी *तर्क,प्रमाण व युक्तियोंं* से ही होगी मगर *विश्वास* तो खुद ही करना पड़ेगा।उदाहरण के लिए – ये हमारे माता-पिता हैं इस बात पर हम बिना प्रमाण के ही तो *विश्वास* करते हैं।क्योंकि जब हमारा जन्म होता है यब हमें ये ज्ञान नहीं होता है कि ये हमारे माता-पिता हैं इन्होने हमें जन्म दिया है।इसी तरह हमें ईश्वर पर भी *विश्वास* करना होता है कि संसार को ईश्वर ने ही जन्म दिया है और ईश्वर हम सबका माता पिता है।
किसी की बात को हम *कान* से सुनते हैं।किसी पुष्प के रंग को हम *आंख* से देखते हैं।किसी पुष्प की सुंगध को हम *नाक* से सूंघते हैं। पानी गरम है या ठंठ इसको हम *त्वचा के स्पर्श* से जानते हैं।आम मीठा है और इ ईमली खट्टी है इसे हम *रसना* से जानते हैं। यहां पर आप एक नियम को देख रहे हैं कि हर चीज को देखने का यंत्र अलग-अलग है। इसी प्रकार *ईश्वर* को हम *आंख* से देख नहीं सकते।नाक से *सूंघ* नहीं सकते। कान से *सुन* नहीं सकते? जीभ से *चख* नहीं सकते।त्वचा से ईश्वर को *छू* नहीं सकते!
कयोंकि *ईश्वर निराकार* है।ईश्वर का कोई *रंग -रुप,आकार-प्रकार ,चित्र-हित्र, मूर्ति ,शरीर* नहीं होता।ईश्वर का न जन्म होता न ही मृत्यु होती। कल्पना करो *ईश्वर का जन्म होगा तो उसका पालन कौन करेगा? क्योंकि सब का पालन तो ईश्वर करता है।और ईश्वर जब मर जायेगा तो संसार को कौन चलायेगा क्योंकि संसार चलाने का ज्ञान ईश्वर के अलावा* कोई नहीं जानता।
✍️✍️ यक्ष प्रश्न✍️✍️
यह तो समझ में आ गया कि ईश्वर निराकार है।मगर जैंसे *आंख* रुप देखती है। *कान* शब्द सुनते हैं। *नाक* गंध का पता लगाती है। *जिह्वा* स्वाद का पता लगाती है। *त्वचा* शीत-गरम का पता लगाती है वह कौन सा *यंत्र है और कौन सी विधि* है जिससे ईश्वर दिखाई देगा?
🏵️ यथार्थ उत्तर 🏵️
बहुत ही उत्तम प्रश्न आपका है।यही प्रश्न करने का सही तरीका है।अब उत्तर भी ध्यान से सुनें।
*[१]* ईश्वर जैंसे पुष्प दिखाई देता है। मनुष्य की बनाई मूर्ति दिखाई देती है।वैंसे नही दिखाई देता क्योंकि ईश्वर *आकार रहित व निराकार* है।अत: ईश्वर का *अनुभव* होता है।बोल-चाल की भाषा में कह दिया जाता है कि ईश्वर दिखाई देता है मगर सत्य यही है कि *ईश्वर आंखों से नहीं मन से दिखाई देता है* मन की आंख नहीं होती अपितु मन को *अनुभव* होता है ईश्वर का जैंसे *सुख-दु:ख* का अनुभव होता है।
*[२]* अब रही बात कि वह *यंत्र कौन सा है जिससे हम ईश्वर का अनुभव करते हैं। इसको जानने से पहले एक बार यह जानना जरूरी है कि *ईश्वर निराकार* है।जब ईश्वर निराकार है तो वह *यंत्र भी निराकार होना चाहिए जिससे ईश्वर दिखाई दे मतलब अनुभव में आये! वह यंत्र है *मन*। जैंसे *ईश्वर निराकार है वैंसे मन भी निराकार* है। निराकार मन में ही निराकार ईश्वर की अनुभूति है जाती है।
✍️✍️ यक्ष प्रश्न? ✍️✍️
*इसका मतलब पहले निराकार मन को देखें तब ही निराकार परमात्मा को देखा जा सकता है?*
🏵️ यथार्थ उत्तर 🏵️
एकदम सही समझा आपने! निरकार परमात्मा को जानने से पहले निराकार मन को जानना जरुरी है। इतना ही नहीं *मन,आत्मा,परमात्मा* तीनों निराकार हैं। *मन* से अधिक सूक्ष्म *आत्मा* व आत्मा से अधिक सूक्ष्म *परमात्मा* है। अत; पहले मन को समझें।फिर आत्मा का अनुभव करें !तब जानकर ईश्वर का साक्षात्कार होगा। यह इतना सरल नहीं है कि *महाकुंभ* में डुबकी लगाए हो गया बेड़ा पार।यदि इतना सरल होता तब तो दुनिया में सब रात-दिन पापों में रत रहते और साल मे *कुंभ मे स्नान* करके फिर पाक है जाते। पापों से मुक्ति केवल *ज्ञानकुंभ* में स्नान करने से ही होगी!
✍️✍️ यक्ष -प्रश्न ✍️✍️
*ज्ञान कुंभ में स्नान की विधि क्या है?*
🏵️ यथार्थ उत्तर 🏵️
प्रतिदिन प्रात:काल शीघ्र उठकर पहले शौच-स्नान आदि कर लें। फिर अपने ही घर पर किसी स्वच्छ स्थान पर बैठें जहां हवा भी शुद्ध हो। फिर धीरे से अपनी आंखें बंद करें। फिर अपने *मन रुपी यंत्र* को बाहर के चिंतन से हटाकर *हृदय,नाभि,नासिका का अग्र भाग,या भृकुटि* पर टिकाने के लिए मेहनत करें।यह काम एक दिन में नहीं होगा इसके लिए *प्रतिदिन अभ्यास करें ओर निराश न होवें।धैर्य के साथ यदि एक माह तक १५ मिनट भी करेंगे तो सफलता की गारंटी है* मगर यह भी ध्यान रहें यदि आपने यह कहकर छोड़ दिया कि ये काम कठिन है तो यह बात भी *गांठ बांध लीजिए कि इसके अतिरिक्त दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है*।अब मन ही मन ईश्वर से बात कीजिए।हे प्रभू! मैं आपके ध्यान में बैठ रहा हूं।अब आपके अलावा दूसरे विषयों में मन को नहीं जाने दुंगा।यदि चला जाए तो घबरायें नहीं फिर उसे वापस ध्यान में लगायें। ध्यान में आप *अर्थ सहित गायत्री मंत्र या ओ३म्* * का चिंतन करें।अर्थ या मंत्र नहीं आता तो किसी विद्वान की सहायता लें।
इस प्रकार *धैर्य,निष्ठा,विश्धास,उत्साह* के साथ प्रतिदिन कम से कम *३० मिनट* का अभ्यास करेंगे तो एक दिन भगवान की कृपा होगी तब *निराकार मन,आत्मा व परमात्मा* तीनों का साक्षात्कार (अनुभव) हो जायेगा। फिर किसी *महाकुंभ में जाकर जान* नहीं गवानी पड़ेगी। *भगवान राम,भगवान श्रीकृष्ण,भगवान शंकर* सबने इसी ज्ञानकुंभ में स्नान करके परमात्मा का साक्षात्कार किया व पापों के बंधन से छूटकर मुक्ति पाई है।
*एक शब्द में सब कहा,एक ही अर्थ विचार।*
*भजिए निर्गुण ब्रह्म को तजिए व्यर्थ विचार।।*
शेष कल क्रमश:…….
आचार्य सुरेश जोशी
*वाट्सप गुरुकुल महाविद्यालय* आर्यावर्त्त साधना सदन दशहरा बाग बाराबंकी उत्तर प्रदेश!