ग़ज़ल
कामों में मेरे कोई करीना भी नहीं है।
सच बात यही है कि सलीका भी नहीं है।
नादिम हूं अभी ख़ुद से निगाहें भी झुकी हैं।
पूरा जो किया कोई फ़रीज़ा भी नहीं है।
बेमन से किया काम पसीना भी बहाया।
बेसूद मिला कोई नतीजा भी नहीं है।
होता था कभी रोज़ यहां कोई करिश्मा।
होता है मगर अब तो करिश्मा भी नहीं है।
नेकी पे चलाए जो बदी से भी बचाए।
आता है यहां अब वो फ़रिश्ता भी नहीं है।
अपनों में गिनेंगे वो कहां कोई बताए।
बातों पे मेरी जब कि भरोसा भी नहीं है।
रुकता न किसी ठौर कभी रूप जी वह तो।
वो ढूंढ रहा किसको बताता भी नहीं है।
रूपेंद्र नाथ सिंह रूप