दीनदयाल का समाजवाद

 

ऐसा चाहूं राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ों सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न।।
रैदास की यह पंक्ति एक आदर्श राज्य की स्थिति को बयां करती है। इस आदर्श राज्य के लिए भारतीय संस्कृति में रामराज्य शब्द का प्रयोग किया जाता है। उपाध्याय जी इसी रामराज्य को ही सच्चा मानते हैं। पर उनका यह राज्य किसी संप्रदाय विशेष का प्रतिनिधित्व न करके समग्रता का सूचक है। वे ऐसे राज्य के आग्रही थे जिसमें अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों को प्रमुखता हासिल हो। सभी जन यदि अपने-अपने कर्तव्यों का पालन समुचित रूप से करें तो फिर अधिकारों की मांग स्वत: गौण हो जायेगी। यह भारतीय संस्कृति की खासियत रही है कि यदि हम अपने दायित्व का निर्वाहन ज़िम्मेदारियों से बाखूबी करते हैं तो फिर यह समाज आपको स्वत: अधिकारों की स्वीकृति देता है।
उनका मानना था कि व्यक्ति और समाज खंडित विचार नहीं है। यह भारतीय चिंतन धारा की विशेषता है कि वह व्यक्ति और समाज में द्वंदात्मक की स्थिति न मानकर परस्पर समन्वय की भावना में विश्वास करती है। यदि हम इस तथ्य को ह्रदयंगम कर ले तो फिर विभिन्न सात्ताओं के बीच जो संघर्ष होते रहते हैं उसे शमित किया जा सकता है। वास्तव में व्यक्ति तथा समाज में जो छिट-पुट संघर्ष होते रहते हैं वह संस्कृति की विशेषता न होकर एक प्रकार की विकृति है। दीनदयाल जी ने एक बार कहा था कि लंका में सोने की ईंटें होंगी किंतु वहां रामराज्य नहीं होगा। कर्तव्यपारायणता, नैतिकता,नीति, समता, संपन्नता तथा समन्वयवाद से ही इस आदर्श तक पहुंच सकते हैं। जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में इसी समन्वय को प्रमुख स्थान देते हुए लिखा है-
शक्ति के विद्युत कण जो व्यस्त, विकल बिखरे है निरुपाय।
समन्वय उनका करें समस्त विजयनी मानवता हो जाय।।
व्यक्ति तथा समाज स्वतंत्र होते हुए भी एक दूसरे के पूरक है। उनका मानना था कि मानव केवल व्यक्ति मात्र नहीं है अपितु शरीर, मन ,बुद्धि तथा आत्मा का समुच्चय है। पश्चिम के दार्शनिकों जैसे हाव्स,लाक तथा रुसो के अनुसार समाज व्यक्तियों का समूह मात्र है जिसका निर्माण सामाजिक समझौते के सिद्धांत के आधार पर होता है। जबकि उपाध्याय जी का मानना था जिस प्रकार व्यक्ति स्वयंभू होता है उसी प्रकार समाज भी है। व्यक्तियों से मिलकर समाज नहीं बनता है अपितु वह मनुष्य की भांति एक जीवमान सत्ता है। इसकी भी अपनी आत्मा तथा शरीर होती है। जिस प्रकार से मनुष्य का एक जीवंत व्यक्तित्व होता है उसी प्रकार से समाज का भी अपना एक अनोखा चरित्र होता है। उनमें किसी भी प्रकार की कृत्रिमता नहीं होती है। इस सजीवता के कारण दोनों में अन्योन्याश्रित संबंध होता है। यदि किसी काल में समाज के व्यक्तियों के व्यक्तित्व क्षीण होने लगते हैं,जीवन मूल्यों का ह्रास होने लगता है तो उसी के अनुपात में समाज में भी गिरावट देखने को मिलती है। ऐसे में व्यक्ति, समाज का एक गतिशील घटक है‌।समाज की भी व्यक्ति के समान शरीर,मन बुद्धि तथा आत्मा होती है।
आज के इस मशीनी युग में मनुष्य का अपने काम के प्रति सनक होती जा रही है। वह अपनी कार्यक्षमता की तुलना किसी अन्य व्यक्ति से न करके यंत्रवत मशीन से करने लगा है। ऐसे में वह कल का पुर्जा बनकर रह जाता है। कार्यों के प्रति यह स्वयं की सनक या शासन- प्रशासन द्वारा ऐसे शिकंजे जिसमें कसकर मनुष्य यंत्रवत होने के लिए बाध्य हो जाता है, उसके वे शख्त खिलाफ थे। वे व्यक्तियों के स्वतंत्रताओं तथा अभिलाषाओं का सदैव सम्मान करते थे। शासन प्रशासन तथा समाज की भूमिका व्यक्ति के लिए एक मां जैसी होनी चाहिए। उसका याद दायित्व होता है कि वह व्यक्ति की विकास के लिए श्रेष्ठतम सुविधाएं तथा अवसर उपलब्ध करायें। जिससे व्यक्ति सक्षम होकर पुनः अपने सत्कर्म समाज को समर्पित करता हुआ चले। जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में लिखा है-
दया,माया ,ममता लो आज, मधुरिमा लो अगाध विश्वास।
हमारा हृदय रत्ननिधि स्वच्छ, तुम्हारे लिए खुला है पाश।।
भारतीय शास्त्रों में यह अवधारणा मिलती है कि एक दिव्य पुरुष के विभिन्न अंगों से चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई है। इस उत्पत्तिबोध के आधार पर इन वर्णों में श्रेष्ठता तथा हीनता का निर्धारण होता है। इसी के चलते वर्ण व्यवस्था में अनेक प्रकार के दोष प्रवेश कर गए। समाज में जातिवाद तथा अस्पृश्यता जैसे जघन्य व घृणित दोष मुंह बाए हुए एक दूसरे को निगलने के लिए तत्पर रहने लगे। पर उपाध्याय जी के दर्शन में ऊंच-नीच, छुआछूत तथा अमीर गरीब जैसे हैं विचारों के लिए कोई जगह नहीं थी। उनका कहना था समाज रुपी इस विराट पुरुष के विभिन्न अंग होने के नाते सभी आवश्यक और आदरणीय है। वह मूर्ख ही कहा जाएगा जो शरीर के विभिन्न अंगों में कुछ को श्रेष्ठ और कुछ को नगण्य बताए। इस अंगीभाव में प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या-द्वेष और संघर्ष के लिए कोई स्थान ही नहीं है। जिस प्रकार शरीर का कोई एक अंग शरीर की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है। उसी प्रकार समाज का कोई घटक या समूह अकेले अपने बलबूते अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता है‌। परस्परावलंबी अथवा इससे भी श्रेष्ठ शब्दों में कहें तो परस्परानुकूलन की जो व्यवस्था भारत में निर्मित हुई एक अत्यंत वैज्ञानिक शास्त्र सम्मत है।
ई.वी.रामास्वामी नायकर पेरियार ने कहा था कि एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के सिद्धांत पर हो सकती है। दीनदयाल भी ऐसे समता,समरसता तथा समग्रता पर भरोसा करते थे। वे संपूर्ण समाज के सम्यक विकास के हिमायती थे। उनका संदेश था कि ग्रामों में जहां समय अचल खड़ा है, जहां माता और पिता अपने बच्चों के भविष्य को बनाने में असमर्थ है, वहां जब तक आशा और पुरुषार्थ का संदेश नहीं पहुंच पाएगा, तब तक हम राष्ट्र के चैतन्य को जागृत नहीं कर सकेंगे। हमारी श्रद्धा का केंद्र आराध्या और उपास्य,हमारे पराक्रम और प्रयत्न का उपकरण तथा उपलब्धियों का मानदंड वह मानव होगा जो आज शब्दश: अनिकेत और अपरिग्रही है।
इस प्रकार पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने मनुष्य तथा समाज में एकत्व की स्थापना का प्रयास अपने विचारों के माध्यम से किया। दोनों की सत्ता पृथक होते हुए भी एक-दूसरे से अभिन्न है। यदि हम व्यक्ति की चिंता करते हैं तो व्यक्तिवादी कहलाते हैं तथा यह समाज की चिंता करते हैं समाजवादी कहलाते हैं। जबकि सत्य यह है कि व्यक्ति के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती और समाज के बिना व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं होता है। ऐसे में समाजवाद के नाम पर व्यक्ति के सभी अधिकार राज्य में समाविष्ट कर देना और समाज को राज्य का पिछलग्गू बना देने के बजाय वे व्यक्ति तथा समाज के स्वतंत्रत अस्तित्व में विश्वास करते हैं।

नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती
8400088017

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *