जब कभी सामने नज़रों के सनम आते हैँ-असलम तारिक

ग़ज़ल 

याद बे साखता गुज़रे हुए गम आते हैँ
दौरे गर्दिश के जो नज़रों में सितम आते है

जब कभी पास मेरे होते हो तुम जाने ग़ज़ल
हर घड़ी मेरी तरफ लुत्फ़ो करम आते हैँ

रूह ने जिनकी है लब्बैक की आवाज़ सुनी
रब की तौफ़ीक़ से वो लोग हरम आते हैँ

आज का दौर मशीनी है किसे है फुरसत
अस्ल में इसलिए मेहमान भी कम आते हैँ

मुंतज़िर् ऑंखें बिछाये हूँ मै इक मुद्द्त से
मेरे घर देखिये कब उनके क़दम आते हैँ

जो पड़े राह में हैँ उनको कभी मत छूना
अब खिलौनों में भी रक्खें हुए बम आते हैँ

नाज़ जिन पे था कभी अहले नज़र को यारो
अब वो उर्दू के रिसाले भी तो कम आते हैँ

दूर हो जाते हैँ गम सारे ही मेरे तारिक़
जब कभी सामने नज़रों के सनम आते हैँ

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