वैदिक साधन आश्रम तपोवन के उत्सव का तीसरा दिन-

ओ३म्
-वैदिक साधन आश्रम तपोवन के उत्सव का तीसरा दिन-
“आर्य वह मनुष्य होता है जो श्रेष्ठ गुण, कर्म एवं स्वभाव से युक्त होता हैः आचार्या डा. अन्नपूर्णा”
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आज वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून के ग्रीष्मोत्सव का तीसरा दिन था। आज प्रातः वृहद यज्ञ आचार्य रवीन्द्र कुमार शास्त्री जी के ब्रह्मत्व में सम्पन्न हुआ। यज्ञ की पूर्ति के अनन्तर श्री नरेन्द्र दत्त आर्य, बिजनौर के भजन भी हुए। कार्यक्रम का सुन्दर संचालन हरिद्वार से पधारे आर्य विद्वान श्री शैलेशमुनि आर्य जी ने किया। आज यज्ञ के बाद आश्रम के सभागार में महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में आचार्या सत्यवती जी, आचार्या डा. अन्नपूर्णा, आचार्या डा. सुखदा सोलंकी, श्रीमती इन्दु बाला, श्रीमती मीनाक्षी पंवार, श्रीमती कमला नेगी, श्रीमती पुष्पा गुसाईं, श्रीमती सुषमा शर्मा, श्रीमती अरूणा गुप्ता आदि विदुषी आचार्यायें सम्मिलित थीं। महिला सम्मेलन के आरम्भ में एक बालिका द्वारा एक भजन प्रस्तुत किया गया जिसके बोल थे ‘संसार मुसाफिर-खाना है इसका दस्तूर पुराना है, एक रोज यहां पर आना है एक रोज यहां से जाना है।’ महिला सम्मेलन का कुशल संचालन श्रीमती पुष्पा गोसाईं जी ने किया। सम्मेलन की अध्यक्षा आचार्या सत्यवती जी को बनाया गया था। सम्मेलन में एक अन्य कन्या ने भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘जितने दिन भी जियो बड़े प्यार से जियो, पतझड़ में क्या मिलेगा बहार में जियो।’ इसके बाद कुछ अन्य बहिनों ने गीत एवं भजन गाकर अपनी प्रस्तुतियां दीं। महिला सम्मेलन में व्याख्यान श्रृंखला के आरम्भ से पूर्व द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल की छात्राओं ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। इसके बाद इन्हीं छात्राओं ने एक भजन प्रस्तुत किया जिसके बोल थे ‘मेरे देश की बहिनों तुमको देख रही दुनिया सारी, तुम पर बड़ी है जिम्मेदारी।’

महिला सम्मेलन को प्रसिद्ध विदुषी आचार्या डा. अन्नपूर्णा जी ने सम्बोधित किया। उन्होंने कहा कि वेद समस्त ज्ञान व विज्ञान का भण्डार है। सृष्टि के आरम्भ ने सर्वव्यापक एवं सर्वान्तरर्यामी परमात्मा ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा की आत्माओं में एक-एक वेद का ज्ञान स्थापित किया था। आचार्या जी ने कहा कि मनुष्य एवं सभी प्राणियों की आत्मा अमर एवं नाश से रहित सत्ता है। आचार्या जी ने आगे कहा कि जिन ऋषियों की आत्मा में परमात्मा ने वेदों का ज्ञान दिया था, वह चारों आत्मायें अन्य सभी मनुष्य आत्माओं से अधिक शुद्ध, पवित्र एवं वेद ज्ञान को ग्रहण एवं धारण करने में पात्र थीं।

आचार्या अन्नपूर्णा जी ने बताया कि वेदों का ज्ञान सबसे अधिक शुद्ध एवं पवित्र ज्ञान है, इसलिये कि यह ज्ञान परमात्मा द्वारा मनुष्यों को उनके कल्याण एवं सर्वविध उन्नति के लिये दिया गया है। उन्होंने कहा कि आर्य वह मनुष्य होता है जो श्रेष्ठ गुण, कर्म एवं स्वभाव से युक्त होता है। उन्होंने कहा कि जिन मनुष्यों के गुण, कर्म एवं स्वभाव श्रेष्ठ एवं वेदों के अनुरूप आचरण वाले नहीं हैं, वह मनुष्य आर्य नहीं कहला सकते। विदुषी आचार्या जी ने कहा कि धरती हम सबकी माता है और हम इसके पुत्र व पुत्रियां हैं। धरती मां सब प्राणियों को धारण एवं सबका पालन करती है। आचार्या जी ने नारी को राष्ट्र का आधार बताया। उन्होंने कहा कि यदि नारी विदुषी, धार्मिक व सुसंस्कारित होगी तो उसका परिवार भी अच्छे गुणों व संस्कारों वाला होगा। उन्होंने श्रोताओं को कहा कि अपने घरों में अपने बच्चों वा सन्तानों को वेदों के अनुसार श्रेष्ठ संस्कार दें। उन्होंने कहा कि इसके लिए माता पिता का भी वैदिक संस्कारों एवं ज्ञान से युक्त होना आवश्यक है। आचार्या अन्नपूर्णा जी ने कहा कि बालक व बालिकाओं के आचार्यों को महान्, आदर्श चरित्र वाला तथा तपस्वी होना चाहिये तभी वह अच्छे युवकों का निर्माण कर सकते हैं। आचार्या जी ने बाल्मीकि रामायण से राम व लक्ष्मण के मध्य हुआ एक संवाद प्रस्तुत किया। लक्ष्मण जी ने राम से पूछा था ऐसा कौन व्यक्ति हो सकता है जो वन आदि किसी एकान्त स्थान में युवती, कंचन, सोने आदि बहुमूल्य पदार्थों को देखे परन्तु उसका मन उन्हें प्राप्त करने का न करे और वह अपने मार्ग पर इन पदार्थों की उपेक्षा करके आगे बढ़ जाये। इसका उत्तर राम ने यह कहकर दिया कि जिसकी माता और पिता धार्मिक एवं चरित्रवान् हैं, माता पतिव्रता है, उनका पुत्र ही संसार के सभी प्रकार के प्रलोभनों की उपेक्षा कर सकता है और वह अपने अभीष्ट को नहीं भूलेगा और कंचन आदि की उपेक्षा कर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ेगा।

आचार्या जी ने कहा कि परमात्मा संसार के कण-कण में व्याप्त वा विद्यमान है। वह सभी पदार्थों के भीतर भी है और बाहर भी है। वह अनादि, अमर, अविनाशी, शुभकर्मों का प्रेरक, सृष्टि का रचयिता एवं संचालनकर्ता है। वही सब जीवों को उनके पूर्व जन्मों के कर्मानुसार मनुष्य आदि प्राणियों के रूप में जन्म देता व उनकी रक्षा करता है। सभी को उस परमात्मा की उपासना करनी चाहिये। आचार्या जी ने यह भी बताया कि एक दीपक लाखों दीपकों को जला सकता है। इसी प्रकार से एक विद्वान भी सैकड़ों लोगों के जीवन का निर्माण कर उन्हें चरित्रवान् एवं विद्वान् बना सकता है।

आचार्या अन्नपूर्णा जी के बाद श्रीमती कमला नेगी जी ने योग विषयक कुछ सामान्य शंकाओं का समाधान किया। इसके बाद भी अनेक आचार्याओं के उपदेश सभागार में हुए। अपनी अनुपस्थिति के कारण हम उन्हें प्रस्तुत करने में असमर्थ हैं। आश्रम के पांच दिवसीय ग्रीष्मोत्सव की समाप्ति रविवार 18 मई, 2025 को प्रातः कालीन यज्ञ एवं समापन सत्र से होगी जो दिन में 1.00 बजे समाप्त होगा। आज का कार्यक्रम अत्यन्त लाभकारी था। कार्यक्रम में श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी, श्री सुशील भाटिया, श्री प्रवीणानन्द वैदिक जी गोवा, श्री अतुल भाटिया बिजनौर, श्री रोशन लाल आर्य लुधियाना सहित प्रसिद्ध विद्वान पं. उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी, श्री नरेश दत्त आर्य जी, श्री पीयूष शास्त्री जी आदि उपस्थित थे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य