मैं तो ख़ुद बनके बिगड़ने का नहीं हूँ क़ायल, कैफ बनारसी,,,,,,,
अनुराग लक्ष्य, 30 मार्च
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता।
मुंबई की सरज़मीन पर यूँ तो सैकड़ों शोअरा ऐसे हैं, जिनकी काबिलियत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उसी भीड़ में एक ऐसा मोअतबर शायर भी है जो अपने खास लब ओ लहजे के लिए जाना और पहचान जाता है। दुनिया ए अदब जिसे कैफ हुसैन बनारसी के नाम से जानती और पहचानती है। मैं सलीम बस्तवी अज़ीज़ी आज उसी शायर की एक खास ग़ज़ल आप समयीन तक पहुंचा रहा हैं इस उम्मीद के साथ कि आपका भरपूर प्यार और दुलार कैफ हुसैन बनारसी के हिस्से में आयेगा।
1 /
अर्ज़ ए अहवाल में जो जज़्ब ए जुनूं है क्यूं है,
और सितम ये है के उस में भी सुकूं है क्यूं है ।
2/
आख़िरश तेरे कहे पर ही चला जाता हूं,
ये मेरा ज़ौक़ है या रंग ए फ़ुसूं है क्यूं है ।
3/
मैं तो ख़ुद बन के बिगड़ने का नहीं हूं कायल ,
मेरे लहजे में जो ये कुन-फ़-यकूं है क्यूं है ।
4/
रोज़ ओ शब ख़ुद को खंगाला तो ये महसूस हुआ ,
कोई अहसास अभी मुझमें दुरूं है क्यूं है ।
5 /
मुझको हर दौर में हैरान किए रखता है ,
ये, सवालात के आख़िर में जो क्यूं है क्यूं है ।
6 /
दस्त ए इमकां में तसव्वुर का म’आनी तू है,
दिल को इक रंज है अब कैफ़ जो यूं है क्यूं है ।
कैफ़ हुसैन बनारसी