काव्य: माँ ब्रह्मचारिणी (द्वितीय दिवस)

काव्य: माँ ब्रह्मचारिणी (द्वितीय दिवस)

नव प्रभात की पहली किरण में, तेरा ही उजियारा है,

मां ब्रह्मचारिणी, तेरा रूप तपस्या का सितारा है।

श्वेत वसन में सजी हुई, शांति की तू छाया,

तेरे चरणों में झुककर, हर मन ने सुख पाया।

हाथों में कमंडल, जपमाला का साथ,

भक्ति और साधना का दिखलाती तू पथ।

कठोर तपस्या की अग्नि में, खुद को तूने ढाला,

संकल्प और संयम से, जग को मार्ग संभाला।

तेरी साधना का दीपक, हर दिल में जलता है,

तेरी कृपा से जीवन, सच्चे पथ पर चलता है।

जो भी तेरी शरण में आता, पाता सच्चा ज्ञान,

तेरे आशीष से खिल उठता, हर सूना अरमान।

नवरात्रि के इस द्वितीय दिन, तेरा ध्यान लगाया,

मन, वचन और कर्म से, तुझको ही अपनाया।

तेरी भक्ति से मिटते हैं, हर संकट के बादल,

तेरे नाम से जीवन बनता, निर्मल और उज्ज्वल।

हे मां ब्रह्मचारिणी, तू शक्ति का सागर है,

तेरे बिना ये जीवन जैसे सूना सा आंगन है।

तेरे चरणों में समर्पित है, श्रद्धा का यह फूल,

दे दे हमें धैर्य और शक्ति, कर दे जीवन अनुकूल।

 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़