*नारी सम्मान*
नारी सम्मान के मंचों पर तालियाँ खूब बजती हैं,
शब्दों में उसके त्याग, शक्ति और महानता के गीत गाए जाते हैं।
पर सच तो यह है कि उसकी असली परीक्षा
अक्सर घर की रसोई में ही होती है।
मंच से उतरते ही, सम्मान के शब्द जैसे ही खत्म होते हैं,
वही पुराना सवाल फिर से सामने खड़ा हो जाता है—
“खाना बन गया क्या?”
औरत को चाहे कितने भी पुरस्कार दे दिए जाएँ,
उसका “सम्मान” समाज अक्सर तब ही मानता है
जब वह बाहर की जिम्मेदारियाँ निभाकर भी
घर लौटकर चुपचाप
घर की हर जिम्मेदारी संभालने लगती है।
आजकल नारी सम्मान पर भाषण बहुत होते हैं,
पर एक सच्चाई अब भी अनकही रह जाती है—
औरत काम से लौटकर भी काम ही करती है।
बस फर्क इतना है कि
एक काम की सैलरी मिलती है,
और दूसरे काम की केवल उम्मीद।
मंच पर जिसे बड़े आदर से “आदरणीया देवी जी” कहा जाता है,
घर आते ही उसे फिर याद दिला दिया जाता है
कि देवी को भी
रसोई, बच्चे और
घर की अनगिनत जिम्मेदारियाँ संभालनी हैं।
क्योंकि इस समाज में
नारी को सम्मान शब्दों से तो मिल जाता है,
पर उसकी असली थकान
अक्सर अब भी अनदेखी रह जाती है।नारी सम्मान
नारी सम्मान के मंचों पर तालियाँ खूब बजती हैं,
शब्दों में उसके त्याग, शक्ति और महानता के गीत गाए जाते हैं।
पर सच तो यह है कि उसकी असली परीक्षा
अक्सर घर की रसोई में ही होती है।
मंच से उतरते ही, सम्मान के शब्द जैसे ही खत्म होते हैं,
वही पुराना सवाल फिर से सामने खड़ा हो जाता है—
“खाना बन गया क्या?”
औरत को चाहे कितने भी पुरस्कार दे दिए जाएँ,
उसका “सम्मान” समाज अक्सर तब ही मानता है
जब वह बाहर की जिम्मेदारियाँ निभाकर भी
घर लौटकर चुपचाप
घर की हर जिम्मेदारी संभालने लगती है।
आजकल नारी सम्मान पर भाषण बहुत होते हैं,
पर एक सच्चाई अब भी अनकही रह जाती है—
औरत काम से लौटकर भी काम ही करती है।
बस फर्क इतना है कि
एक काम की सैलरी मिलती है,
और दूसरे काम की केवल उम्मीद।
मंच पर जिसे बड़े आदर से “आदरणीया देवी जी” कहा जाता है,
घर आते ही उसे फिर याद दिला दिया जाता है
कि देवी को भी
रसोई, बच्चे और
घर की अनगिनत जिम्मेदारियाँ संभालनी हैं।
क्योंकि इस समाज में
नारी को सम्मान शब्दों से तो मिल जाता है,
पर उसकी असली थकान
अक्सर अब भी अनदेखी रह जाती है।
नेहा वार्ष्णेय
दुर्ग छत्तीसगढ़