मिट्टी से बनी विरासत : ग्रामीण स्थापत्य की अनोखी मिसाल
सुल्तानपुर (उ.प्र.) के ग्राम सेउर, वि. ख. कूरेभार में स्थित आज़ादी के मतवालों की पनाहगाह रही लक्ष्मण लाल की ऐतिहासिक हवेली
कच्चे मकान प्रायः मिट्टी के बने होते हैं। संभवतः मिट्टी ही सबसे प्राचीन वस्तु है, जिसका उपयोग मनुष्य ने आवास निर्माण के लिए किया। अनंत काल से मिट्टी से दीवारें बनाई जाती रही हैं। प्रारंभिक काल में ये दीवारें टेढ़ी-मेढ़ी होती थीं, जबकि धूप में भली-भाँति सुखाई गई ईंटों से बनी दीवारें अधिक सीधी और मजबूत होती थीं। इसी परंपरा का सजीव उदाहरण उत्तर प्रदेश के जनपद सुल्तानपुर जिला मुख्यालय से लगभग 22 किमी. दूर स्थित विकास क्षेत्र कूरेभार स्थित ग्राम सेउर में लक्ष्मण लाल श्रीवास्तव द्वारा निर्मित दो-मंज़िला कच्ची हवेली है, जो अपनी अनूठी बनावट और ऐतिहासिक भूमिका के कारण आज भी विशिष्ट पहचान रखती है।
मकानों के निर्माण में सामान्यतः चिकनी मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। कई स्थानों पर मिट्टी की मजबूती बढ़ाने के लिए उसमें रेत मिलाई जाती है। यद्यपि सूखने पर मिट्टी सिकुड़ती है, परंतु इससे ईंटों के थोड़ा छोटा हो जाने के अतिरिक्त कोई विशेष हानि नहीं होती। मान्यता है कि सूखने के बाद ईंटों की दाब सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है, जिससे दीवारें अधिक भार सहन कर पाती हैं। कुछ क्षेत्रों में रेत के स्थान पर भूसा या सूखी घास मिलाई जाती है, जिससे मिट्टी की मजबूती बढ़े और सूखने पर दरारें न पड़ें।
गृह निर्माण से पूर्व नींव में नाग और कलश की स्थापना की परंपरा भी इस हवेली के निर्माण काल में प्रचलित थी। नींव खोदने के बाद चाँदी का नाग और ताँबे का कलश स्थापित किया जाता था। कलश की हल्दी, कुमकुम और चावल से पूजा कर उसमें दूध, दही, घी, पुष्प और सिक्का डाला जाता था। मंत्रोच्चार के साथ भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और शेषनाग का आवाहन कर कलश को नींव में स्थापित किया जाता था। मान्यता थी कि इसके उपरांत देवशक्तियाँ स्वयं भवन की रक्षा करती हैं।
सुरक्षा की दृष्टि से उस समय मोटी दीवारों का निर्माण किया जाता था। चोरी और सेंधमारी से बचाव के लिए दीवारों की नींव को हाथियों से पिटवाया जाता था, जिससे दीवारें अत्यंत सुदृढ़ हो जाती थीं। हवेली में लगे भारी लकड़ी के किवाड़, मजबूत कुंडियाँ और लोहे की जंजीरें उस काल की स्थापत्य कला और सुरक्षा व्यवस्था का प्रमाण हैं।
हवेली की प्राचीनता को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लक्ष्मण लाल श्रीवास्तव के पौत्र विद्याधर श्रीवास्तव के शैक्षिक अभिलेखों में जन्मतिथि वर्ष 1932 अंकित है। क्षेत्र के बुजुर्गों का कहना है कि जब से उन्होंने आँखें खोलीं, इस विशाल हवेली को उसी स्वरूप में देखा है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि यह इमारत कम से कम दो शताब्दियों से अधिक पुरानी है। भवन में लगी लकड़ी की कड़ियाँ मनुष्यों द्वारा हाथ से चीरी गई हैं, जो आधुनिक आरी या मशीन से नहीं बनीं। इन तथ्यों के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि इस हवेली का निर्माण 18वीं शताब्दी के मध्य में हुआ होगा।
यह साधारण-सी प्रतीत होने वाली दो-मंज़िला हवेली ऐतिहासिक दृष्टि से इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह कभी आज़ादी के मतवालों की पनाहगाह रही है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी इसे सुरक्षित अज्ञातवास के रूप में उपयोग करते थे। यहाँ देशभक्ति से ओत-प्रोत विचारों का आदान-प्रदान होता था और स्वतंत्रता सेनानियों का जमावड़ा लगा करता था।
कालांतर में प्रखर हिंदूवादी विचारधारा के प्रभाव से यह हवेली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आई और धीरे-धीरे संघ के प्रवास एवं चिंतन स्थल के रूप में पहचानी जाने लगी। यहाँ आने वाले स्वयंसेवकों के लिए भोजन, आवास और अन्य आवश्यक सुविधाएँ हवेली के स्वामियों द्वारा निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती थी।
समय के साथ परिस्थितियाँ बदलीं। परिवार के सदस्य शिक्षा प्राप्त कर सरकारी एवं निजी नौकरियों से जुड़ते चले गए। नौकरी-पेशा जीवन की व्यस्तता बढ़ने के कारण हवेली में पहले जैसी गतिविधियाँ संभव नहीं रहीं। परिवार के लोगों का नौकरी-पेशा हो जाना ही संघ से दूरी बढ़ने का प्रमुख कारण बना। समयाभाव और बदलती जीवनशैली के चलते यहाँ लोगों का आना-जाना धीरे-धीरे कम होता गया और हवेली की सक्रिय भूमिका सिमटती चली गई।
हवेली से जुड़े परिवार का इतिहास भी उल्लेखनीय रहा है। लक्ष्मण लाल श्रीवास्तव के दो पुत्र थे—गया प्रसाद और राम प्रसाद। बड़े पुत्र गया प्रसाद तहसीलदार बने, जबकि छोटे पुत्र राम प्रसाद ने जमींदारी की जिम्मेदारी संभाली। गया प्रसाद की तीन पुत्रियाँ थीं, जिनमें एक जिला विद्यालय निरीक्षक तथा दो इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्या रहीं। राम प्रसाद के पुत्र भी शिक्षित थे और जमींदारी कार्य में सक्रिय रहे। परिवार की शिक्षा, सामाजिक चेतना और प्रशासनिक सहभागिता ने इस हवेली की ऐतिहासिक पहचान को और सुदृढ़ किया।
आज यह हवेली अतीत की अमूल्य स्मृतियों को संजोए हुए खड़ी है। यह न केवल ग्रामीण स्थापत्य कला की उत्कृष्ट मिसाल है, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत की भी मौन साक्षी रहा है।
प्रस्तुति:
सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा उत्तर प्रदेश