महाराजा अहिवरण के वंसज हैं हम – ज्योति वर्णवाल

शीर्षक-“महाराजा अहिवरण के वंसज हैं हम”

 

अयोध्या की पावन माटी से, सूर्यवंश का नूर निकला,

मान्धाता की पीढ़ी में, साहस का कोहिनूर निकला।

रघुवंश की मर्यादा लेकर, क्षत्रिय धर्म निभाया था,

अहिबरन ने बुलंदशहर में, ‘बरन’ गढ़ बसाया था।

यौधेयों की संतान हैं हम, ‘वीर योद्धा’ कहलाते,

पाणिनी और सांकृत्यायन भी, जिनकी गाथा हैं गाते।

हाथों में हथियार सजाए, वीरता जिनका धर्म रहा,

माता चामुंडा की छाया में, सफल हर एक कर्म रहा।

लक्ष्मी माँ का आशीष मिला, सुख-समृद्धि का वर पाया,

बरन नगर की गलियों में, खुशियों का अमृत छलकाया।

पर वक्त की लहरें क्रूर हुईं, जब दुश्मन ने ललकारा था,

सौ वीरों ने बलिदान दिए, पर धर्म न अपना हारा था!

छोड़ चले अपनी जन्मभूमि, वरणावती की राहों से,

गंगा की शीतल लहरों और, काली की पनाहों से।

देश के कोने-कोने में, अपना मान बढ़ाया है,

आज विश्व के हर हिस्से में, बरनवाल कुल छाया है।

छब्बीस दिसंबर की तिथि, गौरव का गान कराती है,

अहिबरन की अमर कहानी, रगों में जोश जगाती है।

आओ मिलकर शपथ लें हम, उस गरिमा को बचाएंगे,

महाराजा के वंशज हैं, जग में नाम कमाएंगे!

 

ज्योती वर्णवाल ✍️

नवादा (बिहार)