टोड़ी का पुरवा नौढ़िया में श्रीमद्भागवत कथा के दौरान रूक्मिणी विवाह प्रसंग पर दिए विचार
अनुराग उपाध्याय की रिपोर्ट
नौढ़िया। टोड़ी का पुरवा नौढ़िया में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दौरान मंगलवार को अत्यंत मनोहारी रूक्मिणी विवाह प्रसंग का वर्णन किया गया। इस अवसर पर कथाव्यास आचार्य देवव्रत जी महाराज ने प्रवचन देते हुए श्रद्धालुओं के समक्ष सच्ची भक्ति और भगवान के चरित्र का सार प्रस्तुत किया।
आचार्य देवव्रत जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि “मन से भगवान के प्रति अनुराग और पूर्ण समर्पण रखना ही सच्ची भक्ति है।” उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का सार बताते हुए कहा कि भगवान ने सदैव नारी के सम्मान और उसकी इच्छा के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों से उसकी रक्षा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान की सभी लीलाएं हमेशा चरित्र प्रधान रही हैं, जो हमें जीवन की नैतिकता सिखाती हैं।
निर्मल साधना से मिलती है भगवत कृपा
आचार्य श्री ने भगवत कृपा का मार्ग बताते हुए कहा कि जिसने भी निर्मलता के साथ आराधना, साधना और संकल्प को पूरा किया है, उसे हर लोक में भगवत कृपा से सुख की प्राप्ति हुई है। उन्होंने बताया कि भक्ति का मार्ग सदैव नैतिकता से प्रकाशित होता है।
वैराग्य का वास्तविक अर्थ
वैराग्य की व्याख्या करते हुए आचार्य देवव्रत जी ने कहा कि वैराग्य का अर्थ जीवन को त्यागना नहीं, बल्कि उसे लोभ, प्रपंच और अविद्या के प्रकोप से मुक्त रखना है। उन्होंने गोवर्धन पूजा के प्रसंग का सार बताते हुए यह भी स्पष्ट किया कि भगवान ने कभी भी अभिमान और अहंकार को स्वीकार नहीं किया है।
कथा के दौरान श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिला। महिलाओं ने व्यासपीठ से मनोहारी मंगलगान प्रस्तुत किया और भावनृत्य के माध्यम से रूक्मिणी विवाह की कथा को और भी मनमोहक और जीवंत बना दिया। कथा श्रवण के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।