ओ३म्
“हमारे एक पुराने स्थानीय आर्यमित्र श्री प्रीतम सिंह आर्य”
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श्री प्रीतम सिंह आर्य जी हमारे एक पुराने आर्यमित्र हैं। वर्ष 1980 के लगभग हमारा आर्यसमाज देहरादून में इनसे परिचय व मित्रता हुई थी। यह हमारे समान वय वाले बन्धु थे। ऐसी ही हमारे अन्य मित्र श्री धर्मपाल सिंह जी, श्री राजेन्द्र कुमार जी एवं श्री शिवनाथ आर्य जी भी थे। विगत 45 वर्षों से हमारे परस्पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध हैं। हम आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के रविवारीय सत्संगों में मिलते रहते हैं। वह महीने में एक या दो बार हमारे निवास पर भी हमसे मिलने आते हैं। आज हम इनका संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं।
श्री प्रीतम सिंह आर्य का जन्म पिता श्री पिल्लू सिंह एवं माता श्रीमती शान्ति देवी जी से जिला बुलन्दशहर के ग्राम सैदपुर में दिनांक 10 जुलाई, 1948 को हुआ था। इनके पिता भारतीय सेना में कार्यरत रहे और नायब सुबेदार के पद से सेवानिवृत हुए थे। आपके तीन भाई एवं 2 बहिनें थीं। आपकी शिक्षा हाईस्कूल एवं आईआईटी (मेरठ, उत्तर प्रदेश से) है। आपकी सरकारी सेवा में नियुक्ति व सेवारम्भ दिनांक 31-10-1972 को देहरादून के राष्ट्रीय दृष्टि बाधितार्थ संस्थान से हुई। इसी संस्थान से आप दिनांक 31-7-2010 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं। आपकी पत्नी का नाम श्रीमती रामवती देवी था जो आपकी सेवानिवृत्ति से कुछ वर्ष पहले दिवंगत हो गईं थी। आपकी तीन पुत्रियां एवं एक पुत्र हैं। सभी विवाहित हैं। आपकी दो नातिनें, तीन नाती तथा दो पौत्र हैं। आपका एक पुत्र एवं दो पुत्रियां देहरादून में तथा एक पुत्री का परिवार दिल्ली के निकट रहता है। सभी बच्चे आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न एवं स्वावलम्बी है।
आप अपने विद्यार्थी जीवन में ही अपनी माताजी के कहने से 16 वर्ष की आयु से ही आर्यसमाज, बुलन्दशहर के सत्संगों में जाने लगे थे। आपकी माता श्रीमती शान्ति देवी जी आर्य विचारों की देवी थीं। घर में आर्यसमाज के भजनों को गाती थीं। जिसका परिणाम यह हुआ कि आप भी उन भजनों से प्रभावित हुए और माताजी के कहने से आर्यसमाज बुलन्दशहर में जाने लगे थे। सन् 1978 में आप देहरादून आर्यसमाज के सदस्य बनें और विगत 47 वर्षों से आर्यसमाज धामावाला देहरादून के सत्संगों में आते हैं। आर्यसमाज के विद्वानों के प्रवचनों को सुनकर आपको भी आर्यसमाज की मान्यताओं व सत्यासत्य का यथोचित बोध हुआ है। आप आर्य विचारधारा के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं। आप अपनी मित्र मण्डली एव परिचित लोगों में ऋषि दयानन्द की विचारधारा का प्रचार भी करते हैं। आर्यसमाज से प्रभावित होकर ही आपने अपनी तीनों पुत्रियों के गुण, कर्म एवं स्वभावानुसार अन्तर्जातीय विवाह किये हैं। अपने निजी जीवन में आप आर्यसमाज की विचारधारा के अनुसार व्यवहार करते हैं। आप दो आर्य मासिक पत्रिकाओं ‘आर्ष-ज्योति’ एवं ‘वेद प्रकाश’ के सदस्य हैं। इन पत्रिकाओं में प्रकाशित सभी लेखों को पढ़ते हैं। आप आर्य जीवन अंगीकार करने के बाद से ही आर्यसमाज के सत्संगों के अतिरिक्त देहरादून की प्रसिद्ध संस्थायें वैदिक साधन आश्रम तपोवन एवं गुरुकुल पौंधा के उत्सवों में भी भाग लेते आ रहे हैं। आयु के 77 वर्ष का होने पर भी आप प्रायः स्वस्थ हैं। अपनी मोपेड से अपने निवाससे लगभग 5 किमी. दूर आर्यसमाज आते हैं। अपने कार्यालय के पुराने मित्रों से भी मिलने उनके पास जाते रहते हैं। श्री प्रीतम सिंह जी के समान ही हमारी आयुवर्ग के अनेक मित्र हैं जो समय समय पर हमारे पास आते रहते हैं। ऐसे अपने पुराने मित्रों से मिलकर और एक दो घंटे व्यतीत कर अच्छा लगता है। हम श्री प्रीतम सिंह आर्य जी के स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन का कामना करते हैं। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य