मिलने जुलने का सिलसिला रखीये -नदीम अब्बासी ‘नदीम’

मिलने जुलने का सिलसिला रखीये,
घर ज़रा शहर में बड़ा रखीये।
वार कैसा हो वो निपट लेगा,
साथ में कोइ दिलजला रखीये।
भाइ कुछ माँगने जो आये कभी,
दिल को अपने ज़रा बड़ा रखीये।
धूप सिद्दत की हो अगर साहब,
दर पे पानी का इक घड़ा रखीये।
मानीये बात आस्तीनों में,
एक दो साँप भी पला रखीये।
मीडिया बात करने आये जब,
कोइ अपना वहाँ खड़ा रखीये।
क्यूँ पशेमा हैं,कहा था किस ने,
ऐसे वैसों से राब्ता रखीये।
इस से पहले कि बोलिए कुछ भी,
सामने अपने आईना रखीये।
जाने कब लौट के वो आ जाये,
घर के दरवाज़े को खुला रखीये।
आफ़ियत चाहिये नदीम अगर,
इश्क़ में ख़ुद को मुब्तिला रखीये।

नदीम अब्बासी ‘नदीम’
गोरखपुर॥