उन्मुक्त उड़ान मंच की संस्थापिका व अध्यक्षा के मार्गदर्शन व नेतृत्व में साप्ताहिक आयोजन के अंतर्गत प्रदत्त विषय हिन्दी हमारी मातृभाषा है,इसे लिखने बोलने या अपनाने में शर्म कैसी? पर मंच के १८ प्रभुद्ध व सक्रिय साहित्य मनीषियों ने अपने अपने विचार प्रकट किए। मंच के उपाध्यक्ष व आयोजन के प्रभारी सुरेशचंद्र जोशी सहयोगी की भावाभिव्यक्ति से चंद पक्तियाँ हिंदी लिखने, बोलने व इसको अपनाने में शर्म का कारण मन के भीतर गहरे तक बैठी हुई गुलामी है जिसे वर्ग विशेष ने निकालने का प्रयास करने के स्थान पर इसे मजबूत ही किया है। संजीव कुमार भटनागर सजग लिखते हैं-हिन्दी हमारी आत्मा की आवाज़ है, जो भावों को शब्द देती है। यह भाषा न केवल हमारी पहचान है, बल्कि हमारी संस्कृति और परंपरा की वाहक भी है। इसकी सरलता और गहराई इसे विश्वभर में विशिष्ट बनाती है। इसे बोलना, लिखना और अपनाना, अपनी जड़ों से जुड़े रहने का प्रतीक है। अनु तोमर अग्रजा के आलेख से चंद भाव-हमारे वेद, पुराण, महा ग्रंथ ,सब हिंदी भाषा और संस्कृत में लिपिबद्ध हैं । फिर क्यों ना हम बच्चों को हिंदी पढ़ाएं और सिखाएं । हिंदी बोलने में ना शर्माएं । हिंदी भाषा हमारी शान, है । हिंदी हमारी मातृभाषा है शर्माना क्यों ? दिव्या भट्ट स्वयं जी ने अपने भाव कुछ इस प्रकार प्रकट किए, आज हम अपनी भाषा से ऐसे विमुख हो रहे हैं, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ को देख दूर भाग जाता है। हिंदी भाषा एक धागे की तरह पूरे देश को जोड़े हुए है। इसका स्थान कोई विदेशी भाषा नहीं ले सकती।अशोक जी की अभिव्यक्ति में से चंद पंक्तियाँ- हमारा वजूद बचाना हो, हमारा देश बचाना हो, हमारी संस्कृति को बचना हो तो ,हमारी भाषा हिंदी अपनाएं, और इसमें बिल्कुल नहीं शर्माए। डॉ. फूल चंद्र विश्वकर्मा भास्कर जी की भावाभिव्यक्ति से विशेष पंक्तियाँ हिंदी भारत की प्राणवायु है, जो उसके प्रत्येक स्नायुओं में रक्त की भांति प्रवाहित होती है। हिंदी ही भारत की जीवनी शक्ति है। नीरजा शर्मा अवनि जी पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं-कहीं भी हिंदी में बात करने में स्वयं को नीचा नहीं समझना चाहिए फिर वह देश हो या विदेश। हिंदी है हम हिंदुस्तान हमारा है। नंदा बमराड़ा सलिला के भाव-हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसमें मां का ममत्व है, जो संपूर्ण देश को एक रक्षा सूत्र में बांधने का काम करती है कुसुम लता तरुषी ने अपने मन के भाव कुछ इस प्रकार प्रेषित किए हिंदी भारत की आत्मा है इसमें ही पुरातन का सब सार समाहित है, फिर हमें हिंदी बोलने में गुरेज क्यों सर्वग्राही हिन्दी का अपनी आत्मा के साथ संबंध और गहरा बनाए। डॉ स्वर्ण लता सोन कोकिला के विचारानुसार, हमें हिंदी को आगे ले जाने के लिए जी जान से प्रयास करना होगा, जो प्रदेश हिंदी भाषी नहीं है, उनको भी हिंदी का प्रयोग आवश्यक करना होगा और वैश्विक स्तर पर इसे एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रस्तुत करना होगा। किरण भाटिया नलिनी के भावों से उद्धृत, हिन्दी भाषा भारत देश में तो बोली ही जाती है, विदेशों में भी खूब बोली जाती है। यदि अपनी बात को हिन्दी भाषा में किसी दूसरे तक पहुँचाने में, समझाने में आप बिलकुल नहीं शर्माते तो आप हिन्दी से प्यार करते हो। वीना टण्डन पुष्करा की-भावाभिव्यक्ति कहती है कि जैसे हम अपनी जन्मदात्री मां का आदर करते हैं, वैसे ही मातृभाषा हिंदी का आदर आवश्यक है। आधुनिकता के नाम पर अधकचरी मिश्रित भाषा बोल कर कुछ लोग अपने को शिक्षित बताते हैं। आवश्यकता है कि शुद्ध हिंदी भाषा को गर्व से बोलें, हम भारतीय मातृभाषा का सम्मान करना जानते हैं। नीतू रवि गर्ग कमलिनी के शब्दों में, विश्व हिंदी दिवस पर ही हिंदी में बात की जाती है, हिंदी में संदेश प्रेषित किए जाते हैं, परंतु अगले दिन से फिर वही अंग्रेजी।मेरा मानना है हिंदी दिवस एक दिन नहीं बल्कि प्रतिदिन होना चाहिए। रंजना बिनानी स्वरागिनी की भावाभिव्यक्ति, हिंदी भाषा हमारे अस्तित्व अस्मिता ,राष्ट्रीयता, एवं संस्कृति का प्रतीक है। हिंदी हमारी मातृभाषा है, फिर इसे बोलते,अपनाने में शर्म कैसी…? आज आजाद भारत के 75 वर्षों में भी हम हिंदी को उसकी गरिमा पूर्ण स्थान नहीं दिला सके, यह हमारी राष्ट्रीयता पर एक गंभीर प्रश्न चिन्ह है। नृपेंद्र चतुर्वेदी सागर के शब्दों में मैं संकल्प लेता हूं कि मैं ज्यादातर कार्य मातृभाषा हिंदी में करूंगा एवं हिंदी बोलने में तनिक भी संकोच नहीं करुंगा। संगीता चमोली इंदुजा कहती हैं, हम सभी का परम कर्तव्य है कि हम हिंदी का मान करें। हिंदी बोलें, हिंदी लिखें, हिंदी समझें और हिंदी भाषा में ही सारे कार्य करें। हिंदी का प्रचार प्रसार करने में जुट कर देश को बचाना है, हिंदी को बढ़ाना है। साहित्यकारों का परम कर्तव्य है कि हिंदी भाषा को बचाने का भरसक प्रयत्न करें। एकता गुप्ता काव्या महक के विचारानुसार, माँ की लोरी से लेकर दादी नानी की कहानियों से शुरू बचपन से युवावस्था, प्रौढावस्था से हमारी अंतिम साँस तक आजीवन हमारी मातृभाषा हमसे जुड़ी हुई है तो क्यों न अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए आम बोलचाल की भाषा में अपने समाज, कुटुबं में शर्म न महसूस करें। मातृभाषा को अपनाकर सर्वोच्च सर्वोपरि रखें, अपनी हिंदी माँ के प्रति ऋण चुकाएँ।
उन्मुक्त उड़ान मंच की संस्थापिका/अध्यक्षा डॉ दवीना अमर ठकराल देविका की भावाभिव्यक्ति के कुछ अंश-यदि हम घर परिवार में बच्चों के साथ हिंदी में ही बोलें, हिंदी में ही संवाद करने के लिए प्रोत्साहित करें, उन्हें हिंदी की महत्ता, सरलता व व्यवहारिक व्याकरण के बारे में आश्वस्त होकर बताएँ, समझाएं तो अवश्य ही बच्चे भी हिंदी भाषा का भी सम्मान करने लगेंगे। हमें भावी पौध को हिन्दी के प्रति सम्मान करना सिखाना ही होगा यह तभी संभव है जब हम पूर्णतया हिंदी व हिंदी साहित्य का सम्मान करने के लिए अपने मन को तैयार कर लेंगे।
बात केवल इतनी सी है हिंदी बोलने, लिखने, पढ़ने में न शर्माएँ हिन्दी को दिल से अपना कर अपना, हिन्द का और हिंदी का मान बढ़ाकर इसके उत्थान की ओर मिल जुल कर अपने क़दम बढ़ाएं। हिंदी भाषा के लिए कोई एक विश्व दिवस या हिंदी दिवस की आवश्यकता नहीं है हमारे हर भाव, हर साँस, हर क्षण, हर आयोजन में हिन्दी इस तरह रच रस बस जानी चाहिए कि हिंदी,हिंद और हिंदुत्व कभी अलग न हो सकें।