तुम्हें चाहने की चाहते हैं दिल में,
तुम्हें भूल जाने की ख्वाहिश नहीं है।
तुम्हें चाहने…..
तुम मेरे जीवन में जीवन को भरते हो,
तुम मेरे होठों पे हंसी बनके खिलते हो,
आंखों में मेरी तेरे ख्वाब पलते हैं।
तुम्हारे बिना हम अधूरे से लगते हैं।
जी सकूं जिंदगी मैं तुम्हारे बिना अब,
ऐसी तो अपनी ख्वाहिश नहीं है।
तुम्हें चाहने……
तुम मेरी सांसों में मेरे साथ चलते हो,
मेरे दिल की धड़कन बनके धड़कते हो,
हों राधे के मन में श्री कृष्ण जैसे,
तुम मेरे मन में भी वैसे ही बसते हो।
तुम्हें खुद से रुसवा करूं भी तो कैसे,
मेरे दिल की ऐसी ख्वाहिश नहीं है।
तुम्हें चाहने……
जैसे बसे हों गौरा में शिव जी,
वैसे ही तुम मेरे जीवन में रहते हो।
तुमसे मैं परिणय करूं भी तो कैसे,
तुम मुझसे जरा भी पृथक तो नहीं हो।
आबद्ध तुमको खुद से रखूं मैं,
ऐसी तो अपनी ख्वाहिश नहीं है।
तुम्हें चाहने की…..
अंजलि श्रीवास्तवा ‘अनु’