एक बार की बात है लंका पति रावण तीनों लोगों पर आधिपत्य प्राप्त करने के लिए और अमरत्व प्राप्त करने की इच्छा से ब्रह्मा जी की तपस्या करने लगा । उसके तप के प्रभाव से संपूर्ण जगत में हाहाकार मच गया तब ब्रह्मा जी प्रकट होकर रावण से बोले, “हे पौलत्स्य! अब तुम अपनी तपस्या को विराम दो और अपने इच्छित वरदान को मुझसे प्राप्त करो। तुम्हारे इस तप के प्रभाव से समस्त लोक भस्मीभूत हो रहे हैं।”
हे वत्स! तुम्हें जो भी वरदान चाहिए मुझसे प्राप्त करो।
ब्रह्मा जी के इस वचन को सुनकर रावण ने कहा, “हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और वरदान देना चाहते हैं तो मुझे अमरत्व का वरदान दीजिए ।”
ब्रह्मा जी ने रावण के वचन सुनकर कहा, “मैं तुम्हें अमरत्व का वरदान तो नहीं दे सकता परंतु तुम कुछ और वरदान माँग सकते हो।”
तब उस परम ज्ञानी रावण ने कहा सुर, असुर,यक्ष, पिशाच,नाग, राक्षस,विद्याधर, किन्नर,तथा अप्सराओं के गण। कोई भी मुझे किसी भी भांति मार न सके इस प्रकार का वरदान मुझे दीजिए ।
इसके अतिरिक्त हे! परमपिता ब्रह्मा जी मुझे आपसे एक अन्य वरदान भी प्राप्त करना है। जो इस भांति है, कि यदि मैं मोहवश अपनी ही पुत्री की आकांक्षा करने लगूँ और उस कन्या की इच्छा ना हो तो ऐसी स्थिति में मेरी मृत्यु हो जाए।
ब्रह्मा जी तथास्तु कहकर अपने ब्रह्म लोक को प्रस्थान कर गए।
उसके पश्चात रावण अपने राज्य लौट गया और त्रिलोक पर अधिकार प्राप्त किया । एक समय की बात है लंकेश रावण दंडकारण के ऋषियों के तेज से प्रभावित होकर उन पर विजय प्राप्त करने की आशा से विचार करने लगा जब तक मैं इन द्विजश्रेष्ठों पर विजय प्राप्त नहीं कर लेता तब तक समस्त जगत का अधिपति कैसे हो सकता हूँ इसी विचार से रावण ने उन्हें बाण की नोक से घायल करके उनके रुधिर को एक कलश में एकत्रित किया। जो कि दैवयोग से वो कलश था जिसमें गृत्समद और उनकी पत्नी द्वारा लक्ष्मी जी को पुत्री रूप में प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन मंत्रों से अभिमंत्रित दूध कुशाग्र द्वारा एकत्रित किया जा रहा था।
ऋषियों द्वारा प्राप्त रक्त को कलश में रखकर रावण अपने महल लौट आया और उसे मंदोदरी के सुरक्षा में रख दिया और बोला हे प्रिये! तुम इस कलश की सुरक्षा करना क्योंकि यह कलश विष से भी अधिक तीक्ष्ण द्रव्य से भरा हुआ है।
त्रिलोक विजय की कामना से रावण देव, दानव, यक्ष तथा गंधर्वों की कन्याओं का हरण करके मंदर तथा सह्य पर्वत पर रमण करने लगा उसके ऐसे कुकृत्यों से मंदोदरी अत्यंत दुखी रहने लगी थी और स्वयं को पति से तिरस्कृत समझने लगी ऐसी स्थिति में उसने सोचा जो स्त्री पति से वंचित है उसके लिए मरण ही उचित है क्योंकि ना ही मेरा यौवन और ना ही रूप सौंदर्य मेरे पति को आकर्षित करने योग्य है ऐसी स्थिति में मुझे धिक्कार है। यही सब सोचते सोचते उसे रावण द्वारा दिया गया वह रक्त से भरा कलश याद आता है जिसे उसने विष से भी तीक्ष्ण बताया था। मृत्यु की इच्छा से मंदोदरी ने उस कलश में रखा ऋषियों का रक्त ग्रहण कर लिया परिणाम स्वरूप मंदोदरी को अत्यंत तेजस्वी गर्भ का आधान हो गया। तब मंदोदरी ने सोचा मैंने तो विष से भी अधिक तीक्ष्ण रक्त पी लिया है जिससे मुझे गर्भधारण हो गया है और इस समय मेरे पति भी मुझसे दूर हैं और लगभग एक वर्ष से हमने सहवास नहीं किया है ऐसी स्थिति में मैं लंकेश से क्या कहुँगी । यही सब सोच कर मंदोदरी चिंता करने लगी और इस स्थिति से निदान पाने के लिए तीर्थाटन के बहाने विमान पर आरुढ़ होकर कुरुक्षेत्र गई और वहां अपना गर्भपात कराया। तत्पश्चात उस भ्रूण को पृथ्वी में गाड़ दिया। जो की एक गुप्त रहस्य ही रहा और सरस्वती के जल से स्नान करके पुनः अपने महल लौट आयी।
कुछ समय पश्चात महात्मा जनक ने कुरुक्षेत्र में आकर कुरुजांगल में यज्ञ किया और सोने के हल से यज्ञ भूमि खोदी। इस सोने के हल की नोक से खोदने पर जमीन में से एक कन्या का प्रादुर्भाव हुआ और कन्या के ऊपर फूलों की बड़ी भारी वर्षा हुई जिसे देखकर राजा जनक को महान आश्चर्य हुआ और किंकर्तव्यविमूढ़ होकर देखते रहे । तब एक आकाशवाणी हुई ,हे राजन ! तुम इस कन्या को पुत्री रूप में प्राप्त कर इसका पालन करो यह कन्या महाभाग्यशाली है जिससे इस जगत का कल्याण होगा। हे राजन! इसका नाम सीता होगा क्योंकि इसकी उत्पत्ति हल की नोक से हुई है।
सीता को पुत्री के रूप में प्राप्त करके राजा जनक अत्यंत प्रसन्न हुए और यज्ञ संपन्न करके पुनः अपने महल लौटकर सीता को अपनी रानी को सौंप दिया जो भी व्यक्ति सीता जन्म की इस कहानी को कहता और सुनता है माँ लक्ष्मी की कृपा का पात्र होता है।
डॉ अनुराधा प्रियदर्शिनी
मथुरा उत्तर प्रदेश