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राम शब्द संस्कृत भाषा के रम् धातु से बना है जिसका अर्थ होता है – रमण करना, निवास करना, विहार करना, बसना इत्यादि।
अर्थात् वे सभी प्राणियों के हृदय में रमण (निवास) करते हैं। इसीलिए राम हैं तथा भक्तजनों सब भी उनमें रमण (ध्याननिष्ठ) करते हैं, वे भी राम हैं।
” रमते कणे कणे इति राम:।”
द्वितीय तथ्यात्मक दृष्टिकोण से:-
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राम शब्द दो शब्दों के मेल से बना है:-
रा + म = राम।
रा – प्रकाश, किरण, आभा, ज्योति
म – मैं, मेरा, स्वयं।
अर्थात् मेरे भीतर प्रकाश, मेरे हृदय में प्रकाश।
राम शब्द रकार, अकार एवं मकार से बना है।
राम शब्द त्रिगुणातीत है।
जबकि, ॐ शब्द उकार, इकार एवं मकार से बना है।
ॐ शब्द त्रिगुणात्मक है।
तुलसीकृत रामायण के अनुसार, श्रीराम का जन्म ‘इच्छवाकु ‘ कुल में हुआ था। इसके अनुसार श्रीराम जी का गौत्र ‘ विवस्वान ‘ था और उनका वंश ‘ सूर्यवंश ‘ था इसलिए वे ‘ सूर्यवंशी ‘ कहलाए।
वे मर्यादा पुरुषोत्तम एवं आदिपुरूष कहलाए।
अयोध्या नरेश दशरथ एवं माता कौशल्या के पराक्रमी, शौर्य, ओजस्वी, तेजस्वी एवं आज्ञाकारी सुपुत्र कहलाए।
राम विष्णुजी के ही अन्य स्वरूप हैं एवं यह त्रेतायुग के हैं।
वाल्मीकि रामायण में राम को ईश्वर के रूप दर्शाया गया है।
जबकि, तुलसीकृत रामायण में भगवान श्रीराम को मानव रूप में दर्शाया गया है।
अतः तुलसीकृत रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम भी बाल्यावस्था में शिक्षा-दीक्षा हेतु उन्होंने दो गुरूओं को अपने जीवन में अपनाया:-
1.अध्यात्म शिक्षा-दीक्षा हेतु महर्षि वशिष्ठ जी को।
2.भौतिक शिक्षा हेतु महर्षि विश्वामित्र जी को।
इसीलिए, उन्होंने ईश्वर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण गुरू को सर्वश्रेष्ठ दर्ज़ा दिया।
आप तुलसीकृत रामचरितमानस के बालकांड में अध्ययन करेंगे:-
” बंदऊ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामहौ तमपुंज, जासु बचन रविकर निकर।। ‘
साथ ही सत्संग महात्म्य के बारे में उल्लेख किया है:-
” तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिअ तुला एक अंग।
तुल न ताहि सकल मिली, जो सुख लव सत्संग। ”
” बिनु सत्संग विवेक न होई।
राम कथा बिन सुलभ न सोई।। ”
” प्रथम भक्ति संतन कर संगा।
दूसरी रति मम कथा प्रसंगा।।”
ईश्वर के बारे में कहा गया है:-
ईश्वर अंस जीव अविनासी।
चेतन अमल सहज सुखरासी।।
मनुष्य रूपी तन के महात्म्य को इस प्रकार दर्शाया:-
” बड़े भाग मानुष तन पावा। ”
जो अंजनी पुत्र पराक्रमी भगवान राम के परम भक्त हनुमान जी को भी मनुष्य रूपी शरीर नहीं प्राप्त हुआ है और इस तन की प्राप्ति हेतु ऋषि-मुनियों, देवी-देवताओं सब भी लालायित रहते हैं। क्योंकि मनुष्य रूपी तन को ब्रह्मांड में निवास करने वाले सभी प्राणियों में श्रेयष्कर है।
राम नाम शब्द वैदिक शब्द हैं साथ ही यह वैज्ञानिक एवं प्रमाणित शब्द हैं। इस शब्द के मात्र दो बार दोहराने से ही 108 बार जाप हो जाती है। साधक के राम शब्द के उच्चारण करने पर जो ध्वनियां उनके मुख से स्फुटित होती है वो ध्वनियां संपूर्ण ब्रह्मांड में गुंजती हैं। राम शब्द बार-बार जपने पर आपके अंदर स्वत: योगासन व प्राणायाम की क्रियाएं होती है जिससे आपके शरीर के अंग क्रियाशील व गतिशील रहती है। आपको अनेक अंदरुनी बीमारियां शनै:शनै: सुधार हो जाएगी। किडनी, फेफड़े, आंत, लीवर, रक्त संचार होती रहेगी एवं आप स्वस्थ रहेंगे। यह वैज्ञानिक एवं प्रमाणित किया गया है। इसके लिए कुछ दिनों तक आध्यात्मिक गुरु के शरण में जाना होगा और उनके समक्ष प्रायोगिक करना होगा। स्वयं से किया हुआ और मंत्र जाप का ग़लत उच्चारण करना साधक के हित के लिए नुकसानदायक साबित होगी। कहा गया है कि कोई भी कार्य या अनुष्ठान यदि करें तो सही से करें और पूर्ण जानकारी लेकर करें अथवा वो कार्य या अनुष्ठान ना करें।
राम शब्द जितना देखने में अल्प प्रतीत होता है पर इस शब्द में बहुत रहस्य छिपा हुआ है और यह शब्द अलौकिक हैं।
राम के दो सबसे बड़े उपासक संत हुए:-
1.संत व महाकवि तुलसीदास जी जो सगुण भक्ति विचारधारा को मानने वाले थे और उन्होंने भगवान श्रीराम को सगुण साकार स्वरूप में माना और राम को प्राप्त किया। उन्होंने रामचरितमानस जैसे महाकाव्य की रचना की।
2.संत कबीरदास जी जो निर्गुण भक्ति विचारधारा के मानने वाले थे और उन्होंने भगवान श्रीराम को निर्गुण स्वरूप में माना और राम को अपने हृदय में दर्शन किया। उन्होंने दोहावली, बीजक इत्यादि अनमोल धार्मिक पुस्तकें लिख डाली। उन पर भी भगवान श्रीराम की असीम कृपा रही।
दोनों भारतवर्ष के संत अति गुणीजन, विद्वान, परम राम भक्त कहलाए। दोनों के द्वारा लिखी हुई ग्रंथों के एक-एक दोहे के पंक्ति पर लोग दिन-रात शोध करते रहते हैं एवं दोनों के द्वारा लिखी हुई ग्रंथों को भारत सहित विश्व में भाषानुवाद किया गया एवं जन-जन तक पहुंचाया गया। विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में कबीर के दोहावली एवं बीजक पढ़ाएं भी जाते हैं। हम केवल कहें कि तुलसीदास जी सर्वश्रेष्ठ हैं या कबीरदास जी तो यह अनुचित होगा। दोनों के भले मार्गं विविध थे पर मंज़िल एक ही थे।
तुलसीदास ने रामचरितमानस को अवधी भाषा में लिख डाली क्योंकि उस समय रामराज्य की भाषा अवध हुआ करती थी और यह भाषा जनमानस के लिए सरल थी। किसी भी देवी-देवता, संत, महापुरुष, धर्म ग्रंथ पर कुछ नकारात्मक विचारधाराएं अपनाने से पूर्व उसके रहस्यमय चीज़ों, वास्तविकता से अवगत हो लें। क्योंकि कोई भी धर्म पावन ग्रंथ, महाकाव्य, वेद, योग, दर्शन लिखने वाले कोई साधारण नहीं होते बल्कि वे उच्च कोटि के विश्व स्तर के सिद्धहस्त पुरूष, परम ज्ञानी, मर्मज्ञ एवं दार्शनिक होते हैं। कुछ अनपढ़ व मूढ़ होते हैं जिनके पास ना के बराबर ज्ञान होते हैं और समाज में लोगों के बीच ज़हर घोलने का कार्य करते रहते हैं। वैसे लोगों से हमेशा सतर्क रहें। वे केवल एक ही मत/संप्रदाय/धर्म को सच्चा समझते हैं।
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जय श्री राम!
जय सीता मैया!
जय विद्यापति!
जय मिथिलाधाम!
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प्रकाश राय
सम्प्रति – युवा साहित्यकार, दार्शनिक, शिक्षाविद् , स्वतंत्र पत्रकार, वक्ता एवं समाजसेवी।
पत्रालय – सारंगपुर, मोरवा, समस्तीपुर, बिहार
चलभाष – 7070532504