मीन संक्रांति का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व बताया गया है। सूर्य जब मीन राशि में परिभ्रमण करता है, तब यह अवस्था सूर्य की मीन संक्रांति कही जाती है। सूर्य का जब-जब गुरु की राशि धनु व मीन में परिभ्रमण होता है अथवा धनु व मीन संक्रांति होती है, वह मलमास (खरमास) कहलाती है। मलमास में मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। भक्ति, साधना व उत्सव का क्रम जारी रहता है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार मलमास में नामकरण, विद्या आरंभ, कर्ण छेदन, अन्नप्राशन, चौलकर्म, उपनयन संस्कार, विवाह संस्कार, ग्रह प्रवेश तथा वास्तु पूजन आदि मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं। जहां सूर्य की मीन संक्रांति में भले ही मांगलिक कार्यों पर विराम रहता है, किंतु भक्ति का क्रम जारी रहता है।
मान्यता है कि इस दिन गंगा, यमुना और सरस्वती आदि पवित्र नदियों में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं। इस दिन वैदिक मंत्रों का उच्चारण करना और दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन प्रातः सूर्योदय के समय किसी पवित्र नदी में स्नान करें। यदि ऐसा संभव न हो तो घर पर ही जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय सूर्य देव को नमस्कार करें और उनसे अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें। इस दिन मंदिर जाकर भगवान् के दर्शन करें अथवा घर पर ही धूप, दीपक, फल, फूल, मिष्ठान आदि से भगवान् का पूजन करें। इसके पश्चात् ज़रूरतमंदों को अन्न, वस्त्र एवं अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करें।
इस दिन भूमि का दान करना विशेष रूप से शुभ फलदायी माना जाता है। इस दिन प्रायः सभी मंदिरों को फूलों से बड़ी ही सुंदरता से सजाया जाता है और दीप जलाये जाते हैं। इस दिन किये गए दान और पुण्य कर्मों से सभी जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं। देश भर के विभिन्न हिस्सों में, विशेष रूप से ओडिशा में मीन संक्रांति का पर्व बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।
मीन संक्रांति का शास्त्रों में बड़ा महत्व बताया गया है। इस दिन को धार्मिक दृष्टि से ही पवित्र एवं शुभ नहीं माना जाता बल्कि व्यावहारिक रूप से भी उत्तम माना गया है। मीन संक्रांति से सूर्य की गति उत्तरायण की ओर बढ़ रही होती है, उत्तरायण काल में सूर्य उत्तर की ओर उदय होता दिखता है और उसमें दिन का समय बढ़ता जाता है जिससे दिन बढ़े और रातें छोटी होती हैं और प्रकृति में नया जीवन शुरू हो जाता है। इस समय वातावरण और वायु भी स्वच्छ होती है, ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन-मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं। रातें छोटी होने के कारण नकारात्मक शक्तियों में भी कमी आती है और दिन में ऊर्जा प्राप्त होती है। इस पुण्य काल में दान स्नान आदि कार्य करने अति शुभ माना गया है। तीर्थ या धार्मिक स्थलों में स्नान करने के लिए पुण्य काल को लिया जा सकता है। मीन संक्राति का पर्व सूर्य की आराधना उपासना का पावन पर्व है, जो तन-मन और आत्मा को शक्ति प्रदान करता है।
खरमास का आरंभ 14 मार्च को होगा और यह 13 अप्रैल को खत्म होगा। खरमास को धार्मिक दृष्टि से अशुभ माना जाता है और इस दौरान कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। 30 दिनों की इस अवधि में ग्रहों के अशुभ प्रभाव अधिक रहने की वजह से शुभ करने की मनाही होती है। आइए जानते हैं खरमास से जुड़ी मान्यताएं और नियम।
खरमास इस साल होली से पहले 14 मार्च से लग रहा है। खरमास साल में दो बार लगते हैं। इस साल का पहला खरमास मीन संक्रांति के दिन से लग रहा है। 14 मार्च को सूर्य मीन राशि में प्रवेश करेंगे और इसी दिन से खरमास लग जाएगा और यह अगले एक महीने तक यानी कि 13 अप्रैल तक रहेगा। इस दौरान शादी, विवाह और मुंडन गृह प्रवेश जैसा कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाएगा। साल में दो बार खरमास लगते हैं। पहला खरमास मीन संक्रांति पर लगता है और दूसरा खरमास धनु संक्रांति के वक्त लगता है।
सूर्य 14 मार्च को राशि परिवर्तन करके कुंभ राशि से निकलकर मीन राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के मीन राशि में आने के साथ ही खरमास का आरंभ हो जाएगा। 13 अप्रैल को खरमास समाप्त होगा। खरमास की 30 दिन की अवधि में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। खरमास में जप, दान और तप करने का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान पवित्र नदी में स्नान करने और तीर्थ दर्शन करने का विशेष महत्व माना जाता है। खरमास में लोग काफी मात्रा में तीर्थ यात्रा पर जाते हैं। पौराणिक महत्व वाले मंदिरों में भी भक्तों की संख्या काफी बढ़ जाती है। इन दिनों में गरीबों की मदद और दान करने से आपको अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
खरमास को लेकर ऐसी ज्योतिषीय मान्यता है कि इस दौरान सूर्य के शुभ प्रभाव में कमी आ जाती है, इसलिए इस दौरान कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। जब सूर्य अपने गुरु की राशि में प्रवेश करते हैं तो उनकी सेवा में लग जाते हैं और उनका प्रभाव कम हो जाता है। किसी भी शुभ कार्य के आरंभ से पहले पंचदेवता में शामिल सूर्य की पूजा होती है। सूर्य का शुभ प्रभाव कम हो जाने की वजह से कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है।
साहित्यकार एवं लेखक-
डॉ आशीष मिश्र उर्वर
कादीपुर, सुल्तानपुर उ. प्र.