ग़ज़ल
मैं उनसे हाथ किसी दिन छुड़ा के लौट आया।
न पूछिए कि क्या क्या गंवा के लौट आया।
ये ज़ख़्म दिल का दिखाना उन्हें ज़रूरी था।
सो ज़ख़्म दिल का उन्हें मैं दिखा के लौट आया।
जुदा हुए थे जहां आप एक दिन मुझसे।
चिराग़ एक वही पर जला के लौट आया।
गया था सोच के उनको मना के लाऊंगा।
ग़ज़ब हुआ कि उन्हें फिर रुला के लौट आया।
जहां लुटा था मेरे प्यार का ख़ज़ीना था।
वहीं पे बैठ के आंसू बहा के लौट आया।
तुम्हारी बज़्म में आया था और कुछ कहने।
मगर जो तुम ने कहा वो सुना के लौट आया।
कभी जो रूप जी ईशार प्यार ने मांगा।
वहां मैं जान की बाजी लगा के लौट आया।
रूपेंद्र नाथ सिंह रूप