जो संसार में रहकर योगी नहीं बन सकते उन्हें हिमालय पर भी सफलता मिलने में संदेह रहेगा

 

मुंडेरवा। स्थानीय थाना क्षेत्र के ग्राम दीक्षापार में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के तृतीय दिवस पर राजा प्रियव्रत की कथा सुनाते हुए कहा की मनुष्य को संसार में रहकर विकारों को त्याग करने का प्रयास करना चाहिए सब कुछ होते हुए भी अनाशक्त का भाव रखना चाहिए । तभी संसार से मुक्त हो पावेगा। उक्त प्रतिक्रिया महाकाल से पधारे महामृत्युंजय पीठाधीश्वर स्वामी प्रणव पुरी जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किया ।उन्होंने जड़ भारत की कथा पर भी प्रकाश डाला और बताया कि संसार पागल को पागल समझता है और पागल सारें संसार को पागल समझता है। असली पागल कौन है यह सोचनीय विषय है। जड़ भरत जी ने संसार के किसी भी गुण को नहीं अपनाया अर्थात यह संसार आपसे नहीं आपके गुणों से प्रेम करता है। जिस समय आपके द्वारा कुछ भी प्राप्त होना बंद हो जाएगा आपके अपने भी आपके प्रति व्यवहार बदल देंगे ।उन्होंने कहा कि यही स्वार्थी संसार का सत्य है ।आगे स्वामी जी ने भगवान के नाम की महिमा बताते हुए अजामिल का प्रसंग सुनाया। आजमिल जीवन भर पाप करता रहा किंतु अंत समय में प्रभु का स्मरण करने से यम यातना से बच गया जो प्रभु एक क्षण में कृपा कर सकते हैं उनका प्रतिक्षण स्मरण करते रहना चाहिए। कलियुग में तो नाम की ही महिमा है।मुख्य यजमान के रूप में रूप में कैप्टन रमाकांत शुक्ल, श्रीमती चंद्रावती देवी, तथा परिवर के अन्य सदस्यों के साथ प्रवचन के समय उमाकांत शुक्ल, शशिकांत शुक्ल, अमित शुक्ल, लक्ष्मीकांत शुक्ल, राम अवध पांडे, रामचंद्र शुक्ल, चिंता हरण शुक्ल, मोहन शुक्ल मेवालाल शुक्ल, सहित तमाम महिला व पुरुष उपस्थित रहे। कथा के मुख्य आयोजक उमाकांत शुक्ल ने समस्त क्षेत्र वासियों से कथा श्रवण करने की अपील किया है।

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