स्वर्णिम यादें बचपन की

बचपन कहने मात्र से ही धूमिल स्मृति साफ नजर आने लगती है, वह भी क्या दिन थे। जहां निष्कपट, निस्वार्थ और दुनियादारी से अंजान एक खूबसूरत सी दुनिया….. हमारी थी।

हमारा बचपन दादी और बाबा के सानिध्य में गुजरा जो कुछ सीखा ,समझा हासिल हुआ उनका ही प्यार आशीर्वाद है। बहुत मन्नत पूजा पाठ से मैं धरा पर आई मां ने अनेक व्रत, पूजा , प्रार्थना, और आराधना किया मुझे इस ग्रह में लाने हेतु।
मुझे घर वालों ने बड़े नाजों कर्मों से पाला तीन लोगों को पापा ने मेरे लिए केयर टेकर भी रखा चमेली , रामू काका और गोपाल बड़े से पलंग जैसा स्पेशल झूला मेरे लिए बनवाया दादी और बाबा बैठ जाते उसमें मुझे झूलाते थे।
सुकून से भरा खुशी से युक्त जीवन मिला फिर हम छे बहन भाई हो गए जिसमें दो हमारे ताऊ की बेटियां थी। गर्मी की छुट्टियां में हम सब मिलकर बहुत धमाल चौकड़ी करते थे। कई तरह के आउटडोर और इंडोर गेम्स खेलते थे। अपनी अपनी साइकिल से लॉन्ग ड्राइव पर जाना सभी को पसंद था दादी और बाबा ने एक नौकर किशोर हमारे देखने के लिए नियुक्त किया था।
कभी-कभी कोई रिश्तेदार जाते वक्त पैसा दे जाते थे वही हमारा पॉकेट मनी होता था जो हम सबको बहुत प्रिय था, वही पांच रुपए हमें खजाना का एहसास दिलाता था।
एक दिन साइकिल रेस करने के बाद हम सब मार्केट जाकर चाट वाला को देख हम चारों ने चाट खाया दो छोटे के पास पैसे नहीं थे वो लोग रोने लगे
वही पास खड़े किन्नर जी जो हमें दादी के साथ जाते देख पहचानते थे।
दोनों छोटे को हमसे ज्यादा चाट पकोड़े खिलाया दोनों खुशी से जा घर पे बता दिया । उस दिन डांट के साथ हमें मार पहली बार पड़ी । फिर दादी और बाबा ने सबको समझाया की मिल बांट कर हमेशा खाना और दूसरे से कभी न खाना प्रेम से सब हमेशा मिलकर रहोगे।इस नसीहत को सभी ने दिल की तिजोरी पे कैद कर लिया
वो दिन और आज का दिन सारी बातें हम सब निभा रहें।
एक बहन 18 साल पहले कान्हा के पास चली गई एक आस्ट्रेलिया
में है ।
सबमें प्यार मोहब्बत दादी और बाबा की वजह से ही बरकरार है।
कनुआ का धन्यवाद करती हूं जिसने मुझे एक खूबसूरत , लाज़वाब ,बेमिसाल प्यारा सा परिवार का हिस्सा बनाया।
Miss you dadi nd dada
प्रज्ञावन ओजस्वी प्रखर वक्ता चिंतक साहित्यकार
डॉ अर्चना श्रेया

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