मैं भी शामिल हूँ मुहब्बत के तलबगारों में
नाम मेरा भी लिखा जाए गुनहगारों में
सर मुहब्बत के गुलाबों का क़लम कर पाएं
इतनी ताक़त नहीं नफरत भरी तलवारों में
एक दरवेश की जिस दिन से हुई है आमद
खलबली सी है मची शह्र के ज़रदारों में
मेरे हर लफ़्ज़ में बस जाती है ख़ुशबू ख़ुशबू
ज़िक्र जब भी तेरा करती हूं मैं अशआरों में
आज दुनिया के खुदाओं से निभा पूछती हूँ
हुस्न क्या अब भी चुना जाएगा दीवारों में।