जिनका सहज स्वाश ही चारो वेद है,वह हरि पढ़े यह कौतुक ही है रत्नेश प्रपन्नाचार्य

 

अयोध्या। सनातन का अर्थ है पुरातन,शाश्वत, सनातन धर्म को सहजमिटाने का प्रयास बहुत दोनो से चल रहा है सनातन ना मिटा ,ना मिटेगा। भगवान राम गुरु के आश्रम में विद्या अध्यन करने जाते है। जिनकी सहज स्वास ही चारो वेद है वह हरि गुरु के घर पढ़ने जाते है यह कौतुक नही तो और क्या है? भगवान चारो भाईयो को अल्पकाल में ही सभी विद्या का ज्ञान हो गया। गुरु जी की सेवा से विद्या अल्पकाल में ही प्राप्त हो जाती है। दशरथ महल,बड़ा स्थान में श्री राम विवाह के पावन अवसर पर विंदु गद्याचार्य स्वामी श्री देवेन्द्र प्रासादाचार्य जी महाराज की अध्यक्षता एवम उनके शिष्य कृपालु महंत राम भूषण दास जी के संयोजकत्व में हो रही श्री राम कथा की सुधावृष्टि में रसशिक्त हो कथा श्रोता भक्त अपना जीवन कृतकृत्य कर रहे है। प्रतिष्ठित कथा व्यास जगदगुरु रामा नुजाचार्य स्वामी श्री रत्नेश प्रपन्नाचार्य जी महाराज भक्तो को श्री राम कथा की मंदाकिनी में अवगाहन कराते हुए कहते है कि महामुनि विश्वामित्र महाराज दशरथ से मिलने आए। दशरथ जी ने महामुनि विश्वामित्र जी महाराज का भव्य आदर सत्कार स्वागत किया, मुनि विश्वामित्र जी प्रसन्न हो गए। विश्वामित्र जी ने महाराज दशरथ से कहा महाराज मैं राम,लक्ष्मण जी को मांगने आया हूं। राक्षसो के वध से मैं सनाथ हो जाऊंगा। महाराज दशरथ ने कहा राम जी के बदले में मैं आपको अपना सबकुछ देने को तैयार हूं, यहा तक कि मैं अपने प्राण भी दे सकता हूं, राम जी को देते नही बन रह है।कथा व्यास श्री प्रपन्नाचार्य जी महाराज भक्तो को कथारस का पान कराते हुए कहते है हे ब्रह्मर्षि वसिष्ठ आपकी कृपा हो जाय तो मुझे ब्रह्म राम जी प्राप्त हो जाय। वशिष्ठ जी के बहुत प्रकार से समझाने पर महाराज दशरथ जी ने दो कुमारों राम,लक्ष्मण को विश्वामित्र जी को प्रदान करते है। दशरथ जी कहते है हे महामुनि राम,लक्ष्मण मेरे प्राण है। आज से आप ही इनके माता पिता है। हमारे राम जी बड़े कृपालु है।ताड़का को एक ही बाण से उसके प्राण हर लिए और उसे अपना धाम भी प्राप्त कराया। व्यास जी कहते है राम जी यज्ञमय है,पहली यात्रा यज्ञ के लिए ही किया,राम जी का प्राकट्य भी यज्ञ ही से हुआ। धनुष यज्ञ सुनकर श्री राम जी हर्ष पूर्वक मुनिवर के साथ चल दिए। मार्ग में एक ऐसा आश्रम दिखा जहां खग मृग जीव जंतु कोई भी प्रवेश नहीं करता। आश्रम में एक शिला देखी तो मुनि विश्वामित्र जी से पूंछा गुरुदेव यह कैसी शिला है। विश्वामित्र जी ने सारी कथा बताई। गुरु जी ने कहा राघव इसका उद्धार करो,यह गौतम जी की पत्नी है जो धैर्य धारण कर आपके चरण कमल रज से उद्धार करें। जिनके चरणों से निकलने वाली गंगा किसी भेद को नहीं मानती। राम जी ने उद्धार किया अहिल्या जी प्रकट हुई,स्तुति की। जिसकी ओर कोई देखता नही था आज श्री रघुनाथ जी ने उनका उद्धार कर दिया। देवी अहिल्या कहती है मुझे आभार प्रकट करना चाहिए। यदि मेरे पति ने श्राप नही दिया होता तो मुझे श्री रघुनाथ जी का दर्शन नहीं होता। व्यास जी कहते है अपनी बुद्धि को श्री रघुनाथ जी के चरणो से जोड़ दो, तुम्हारा भी अहिल्या जैसा उद्धार हो जायेगा। इस पुनीत अवसर पर तन तुलसी द्वाराचार्य, मिथिला पीठाधीश्वर जगद गुरु स्वामी श्री विष्णुदेवा चार्य जी महाराज, श्री महंत राम दास जी महाराज राजस्थान,श्री महंत डॉ रामानंद दास जी महाराज, श्री महंत राघव दास जी ,श्री महंत भानु दास जी महाराज,श्री महंत माधव दास जी महाराज,श्री महंत संत राम दास जी महाराज राजस्थान,महंत श्री बलराम दास जी महाराज हनुमान गढ़ी, महंत श्री रामशरण दास जेजे रामायणी,महंत श्री मनीष दास जी महाराज पत्थर मंदिर,महंत श्री राम जी दास वैदेही मंदिर,संत श्री वरुण दास जी महाराज,संत श्री रामशंकर दास जी सहित अन्य संत,महंत एवम भक्त श्री राम कथारस का पान कर खुद को कृतार्थ करते रहे।

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