अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान: मन की पाँच वृत्तियाँ ही क्लेश और अक्लेश का आधार

अन्तर्जगत् की यात्रा का ज्ञान-विज्ञान: मन की पाँच वृत्तियाँ ही क्लेश और अक्लेश का आधार

 

योग साधना और मन के सदुपयोग से जीवन में दुःख के स्थान पर शांति एवं आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त होता है — डॉ. नवीन योगी

लवकुश सिंह संवाददाता

अनुराग लक्ष्य न्यूज बस्ती

बस्ती। अन्तर्जगत् की यात्रा और मन के स्वरूप को समझने के क्रम में डॉ. नवीन योगी ने महर्षि पतंजलि के योगसूत्र के प्रथम अध्याय के सूत्र “वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः॥ १/५॥” की व्याख्या करते हुए मन की पाँच वृत्तियों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मन की वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं और यही वृत्तियाँ परिस्थितियों तथा उनके उपयोग के आधार पर क्लेश अथवा अक्लेश का कारण बन सकती हैं।

 

डॉ. नवीन योगी के अनुसार महर्षि पतंजलि का यह सूत्र पहली दृष्टि में जटिल प्रतीत होता है, लेकिन इसके गहन अध्ययन और आत्म-अन्वेषण से स्पष्ट होता है कि मन की वृत्तियाँ किस प्रकार व्यक्ति के अनुभव, सुख-दुःख और जीवन-दृष्टि को प्रभावित करती हैं। सत्य की गहराई में उतरने के लिए साधक को बाहरी जगत से आगे बढ़कर अपने अंतर्मन का निरीक्षण करना आवश्यक है।

 

उन्होंने कहा कि अन्तर्जगत् की इस यात्रा की शुरुआत शरीर से की जा सकती है, क्योंकि शरीर से प्रत्येक व्यक्ति का प्रत्यक्ष परिचय है। पंच कर्मेन्द्रियों और पंच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से मनुष्य बाहरी जगत से जुड़ता और उसके अनुभवों का आस्वादन करता है। एक ही परिस्थिति में अलग-अलग व्यक्तियों का अनुभव अलग हो सकता है और इस अंतर के पीछे मन तथा उसकी वृत्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

 

मन सूक्ष्म शरीर का महत्वपूर्ण आधार

 

डॉ. नवीन योगी ने बताया कि मन शरीर से पूरी तरह अलग नहीं है, बल्कि उससे अत्यंत गहराई से जुड़ा हुआ है। योग साधना के माध्यम से साधक धीरे-धीरे यह अनुभव कर सकता है कि दृश्य शरीर स्थूल शरीर है, जबकि अपनी शक्तियों और संभावनाओं के साथ मन सूक्ष्म शरीर के रूप में कार्य करता है। मन का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी शक्तियों और वृत्तियों का उपयोग किस दिशा में किया जा रहा है।

 

उन्होंने कहा कि यदि मानसिक शक्तियों का दुरुपयोग इन्द्रिय भोग, क्षुद्र स्वार्थ और अहंकार की प्रतिष्ठा में होता रहे, तो मन की पाँचों वृत्तियाँ जीवन में क्लेश, दुःख और मानसिक पीड़ा का कारण बन सकती हैं। इसके विपरीत यदि मन का सदुपयोग किया जाए और उसे योग साधना, आत्मचिंतन तथा उच्च जीवन मूल्यों की दिशा में लगाया जाए, तो वही वृत्तियाँ अक्लेश, शांति और आत्मिक विकास का माध्यम बन सकती हैं।

 

सदुपयोग से बदल सकती है जीवन की दिशा

 

डॉ. नवीन योगी ने कहा कि मन की पञ्चवृत्तियों द्वारा जीवन में क्लेश उत्पन्न होने का अनुभव अधिकांश लोगों को प्रत्यक्ष रूप से होता है, लेकिन इन्हीं वृत्तियों को अक्लेश का स्रोत बनाना साधना और सही जीवन-दृष्टि से संभव है। इसके लिए मन को नियंत्रित करने के बजाय उसे समझना, उसकी गति को पहचानना और उसकी शक्तियों को सकारात्मक दिशा देना आवश्यक है।

 

उन्होंने कहा कि “जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठि” की भावना अन्तर्जगत् की यात्रा पर भी लागू होती है। मन और उसकी वृत्तियों के वास्तविक स्वरूप को जानने के लिए बाहरी संसार से भीतर की ओर यात्रा करनी होगी। योग साधना इसी आंतरिक यात्रा को व्यवस्थित और सार्थक बनाने का मार्ग प्रदान करती है।

 

डॉ. नवीन योगी ने कहा कि मनुष्य के जीवन में शांति और आत्मबोध की संभावना उसी समय प्रबल होती है, जब वह अपनी मानसिक शक्तियों को क्षुद्र स्वार्थों में नष्ट करने के बजाय साधना, आत्मअनुशासन और लोकमंगल की दिशा में नियोजित करता है। यही मन की वृत्तियों को क्लेश से अक्लेश की ओर ले जाने का सार्थक मार्ग है।