ग़ज़ल
ढहती हुई बोसीदा ये दीवार सम्भालो,
अब छोड़ो मुआलिज को बीमार सम्भालो।
मंज़िल पे पहुचने की हवस इतना न पालो,
जो कह रहा हूँ मान लो रफ़्तार सम्भालो।
डरता हूँ किसी रोज़ सरक जाए न सर से,
बख़्शी गई है तुमको जो जो दस्तार सम्भालो।
अज़मत पे नबी के अगर आंच आने लगी है,
फिर वक़्त न ज़ाया करो तलवार सम्भालो।
भागा था जो शलवार पहन कर के कोई नर,
चिल्ला के किसी ने कहा शलवार सम्भालो।
जब डी.जे.बजा कर ही मस्जिद से गुजरना है,
तब किस से कहा जाए त्योहार सम्भालो।
मुजरिम भला है कौन इसे राम जी जाने,
बेहतर है नदीम अपना ये अख़बार सम्भालो।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥