
अनुराग लक्ष्य, 28 मई
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
आज पूरे देश में ईदुल अज़हा पूरे जोश ओ खरोश के साथ मनाया जा रहा है। और मुसलमान अपनी अकीदत और मुहब्बत का मुज़ाहरा कर रहे हैं।
हज़रत इब्राहीम अलहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलहिस्सलाम की याद को ताज़ा करते हुए बकरे की कुर्बानी पेश कर रहे हैं।
इस अवसर पर बस्ती शहर में सुबह 6, 45 से नमाज़ों का सिलसिला जो शुरू हुआ तो यह 10 बजे तक शहर की विभिन्न मस्जिदों में ईदुल अज़हा की नमाज़ पढ़ी गई।
इस ख़ास मौके पर जामिया हंफिया के प्रांगड़ में बनी मस्जिद हाफिज ए मिल्लत में मौलाना रेयाज़ अहमद बरकाती ने अपनी तकरीर में कहा कि, ईदुल अज़हा हज़रत ए इब्राहीम अलहिस्सलाम और उनके बेटे हज़रत ए इस्माईल अलहिस्सलाम की याद को ताज़ा करता है। जब तक यह दुनिया क़ायम रहेगी, एक बाप और बेटे की दास्तान भी ज़िन्दा रहेगी।
ईदुल अज़हा हज़रत ए इब्राहीम अलहिस्सलाम और उनके बेटे हज़रत ए इस्माईल अलहिस्सलाम के मुहब्बत की वोह दास्तान सुनाती है जिसमें एक बाप ने अल्लाह की रज़ा के लिए अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए मेना की वादियों में पहुंच गए।
उन्होंने अपनी तकरीर को विस्तार देते हुए कहा, कि यह खुदा की तरफ से यह एक आजमाइश थी, और इस आजमाइश में अल्लाह के नबी हज़रत ए इस्माईल अलहिस्सलाम खरे उतरे। इसी लिए अल्लाह ने एक बाप के हाथों अपने बेटे की गर्दन पर छुरी नहीं चलने दी, और बेटे की गर्दन की जगह अल्लाह के हुक्म से फरिश्तों ने एक दुम्बा रख दिया।
इसी अकीदत और मुहब्बत को ज़िंदा रखने का नाम है कुर्बानी। जिसे इस्लाम धर्म के मानने वाले आज भी कुर्बानी पेश करके एक बाप और बेटे की सच्ची मुहब्बत की मिसाल पेश करते हैं। मौलाना रेयाज़ अहमद बरकाती ने अपनी तकरीर के अंत में मुल्क की खुशहाली और तरक्की के लिए दुआएं भी मांगीं।
आज के इस ईदुल अज़हा के मौके पर बच्चे जवान और बूढ़े भी अपनी नमाज़ को अदा करने के लिए सुबह 6 बजे से ही अपने अपने मुहल्ले की मस्जिदों के साथ भारी मात्रा में शहर के ईद गाह में निश्चित समय पर नमाज़ें अदा करते हुए अपनी अपनी खुशी का इजहार गले मिलकर किया। समाचार लिखे जाने तक कहीं से कोई अप्रिय घटना की सूचना नहीं है।
,,,,,,, पेश काश, सलीम बस्तवी अज़ीज़ी,,,,,,,