चाशनी सा प्रेम – ज्योती वर्णवाल 

कहानी: ‘चाशनी सा प्रेम’

 

बाहर रिमझिम बारिश शुरू ही हुई थी कि रसोई से आती सौंधी महक ने माधव के कदमों को अपनी ओर खींच लिया। वह दफ्तर का काम छोड़कर चुपचाप रसोई की चौखट पर आकर खड़ा हो गया।

अंदर मीरा तन्मयता से कड़ाही में मालपुए तल रही थी। वह लाल साड़ी और माथे पर लगी छोटी सी बिंदिया में बिल्कुल वैसी ही लग रही थी जैसी माधव ने उसे पहली बार देखा था। गरम तेल में जैसे ही मालपुआ पड़ता, एक ‘छन’ की आवाज होती और साथ ही रसोई में इलायची और केसर की खुशबू तैरने लगती।

माधव को देखकर मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “अभी समय लगेगा, इतनी जल्दी क्यों आ गए?”

माधव ने मंद मुस्कान के साथ जवाब दिया, “ये मालपुओं की महक थी या तुम्हारी पायल की छन-छन, जिसने मुझे यहाँ खींच लिया, पता ही नहीं चला।”

मीरा ने शरमाते हुए एक कुरकुरा सुनहरा मालपुआ चाशनी में डुबोया और कहा, “ये आपके पसंदीदा हैं, थोड़े ज्यादा मीठे बनाए हैं।”

माधव ने महसूस किया कि मिठास सिर्फ उन मालपुओं में नहीं थी, बल्कि उस पल में थी, उस साथ में थी। कभी-कभी सुख महंगे होटलों के खाने में नहीं, बल्कि घर की रसोई में अपनों के हाथ से बने उन ‘मालपुओं’ में होता है, जो प्यार की चाशनी में डूबे हों।

 

कवयित्री ज्योती वर्णवाल

नवादा (बिहार)