काव्य : “नारी, किस अग्नि से बचे?”
सीता ने भी अग्नि परीक्षा दी…
सती ने भी आग में कूद गई…
और विडंबना देखिए—
आज की नारी भी
सुरक्षित नहीं है।
युग बदले—कहते हैं लोग,
पर प्रश्न वही खड़ा है…
नारी को हर जन्म में
किस अग्नि से गुजरना पड़ा है?
कभी अग्नि की लपटों में
अपनी पवित्रता साबित करनी पड़ी—
आज उसी नारी को
गलियों–बसों–दफ्तरों में
अपनी सुरक्षा मांगनी पड़ी।
समय बदला,
पर नारी की परीक्षा नहीं बदली—
कभी लंका की कैद थी,
अब समाज की ठंडी नज़रें हैं।
पर याद रखो—
नारी जली जरूर है,
पर बुझी कभी नहीं।
वह राख से उठकर भी
शक्ति बनती है—
और अपने अस्तित्व को
दुनिया के सामने
फिर से सिद्ध करती है।
कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)