मानव शरीर अत्यंत दुर्लभ, प्रभु भक्ति और सेवा से ही संभव है मोक्ष: राजेश महाराज

 

महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। अयोध्या तीर्थ पुरोहित धर्मार्थ सेवा ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश महाराज ने मानव जीवन की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 84 लाख योनियों के चक्र के पश्चात प्राप्त होने वाला यह मानव शरीर अत्यंत दुर्लभ है और इसका मुख्य उद्देश्य जीव आत्मा को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कराना है। पुण्य कर्मों से मिलता है तीर्थ में वास राजेश महाराज ने कहा कि जब कई जन्मों के पुण्यों का उदय होता है, तब जाकर हमें मानव तन प्राप्त होता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उत्तम कुल: कई जन्मों के संचित पुण्यों से अच्छे कुल में जन्म मिलता है। तीर्थ वास उससे भी अधिक पुण्यों के प्रताप से व्यक्ति को तीर्थ क्षेत्र में रहने का सौभाग्य प्राप्त होता है। भक्ति और दया ही है मोक्ष का मार्ग महाराज जी के अनुसार, यह शरीर केवल सांसारिक उपभोग के लिए नहीं, बल्कि जीव कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति के लिए है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि हमें जीवों के प्रति आस्था और दया का भाव रखना चाहिए। भगवान के प्रति निष्ठा रखते हुए निरंतर भजन, जप, तप, पूजा और पाठ करना चाहिए ताकि जीवात्मा को पुनः 84 लाख योनियों में न भटकना पड़े। माया-मोह त्याग कर परमात्मा में विलीन होने का संदेश राजेश महाराज स्पष्ट किया कि अंततः यह शरीर मिट्टी में मिल जाता है, लेकिन जो व्यक्ति माया-मोह के बंधनों को समझकर भगवान के प्रति समर्पित रहता है, उसकी आत्मा का परमात्मा से मिलन निश्चित है। राजेश महाराज ने कहा, अच्छे कर्म और प्रभु भक्ति ही वह माध्यम है जिससे आवागमन से मुक्ति मिलती है और मानव जीवन धन्य हो जाता है।