क्या बिग बजट की फिल्मों की अंधी दौड़ में अब छोटे बजट की फिल्मों का अब कोई अस्तित्व नहीं रहा,,,,


अनुराग लक्ष्य, 1 अगस्त
सलीम बस्तवी अज़ीज़ी
मुम्बई संवाददाता ।
एक दौर था जब आनंद, चितचोर, बावर्ची, नदिया के पार, नूरी जैसी फिल्मों ने फिल्म इंडस्ट्री को अच्छे कारोबार के साथ समाज को स्वस्थ मनोरंजन भी दिया। जबकि उस दौर में भी बड़े बजट वाले निर्माता निर्देशक यश जौहर, विजय आनंद, मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा, रमेश सिप्पी जैसे ख्यातिलब्ध फिल्मकार भी मौजूद थे। ऐसे दौर में भी साफ सुथरी और मुहब्बत प्रधान छोटी बजट वाली फिल्में भी अपनी कामयाबी के परचम लहराने में सफल थीं। लेकिन इस दौर में इस तरह की फिल्मों का पड़ा अकाल इस बात का प्रमाण है कि अब छोटे कलाकारों और छोटे बजट की फिल्मों का दौर समाप्त हो चुका है।
अब सवाल यह उठता है, की गजनी, बजरंगी भाई जान, जवान, पठान, जेलर, वार, क्रिश, बाहुबली जैसी मेगा स्टार वाली फिल्में से ही भारतीय सिनेमा का इतिहास कायम रहेगा। अगर ऐसा है तो यह बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण स्थित है। इसे समझना होगा। इससे लड़ना होगा। इसे परिवर्तित करना होगा, तभी शायद भारतीय सिनेमा ज़िंदा रह सकता। यह मेरे अपने विचार हैं। मेरी सोच है। ज़रूरी नहीं कि मेरे इस लेख और मेरे विचार से आप सहमत हों, इसलिए भारतीय सिनेमा को मेरा सलाम ।