कविता.. महाकुंभ में…
महाकुंभ में..
मैंने चहुंओर एकता देखी
जाति के टूटते बंधन देखे
प्रेम से भरे आलिंगन देखे
स्नेह से जुड़े पग बंधन देखे…
संगम से मिलने की ललक देखी
ईश्वर से जुड़ने की धधक देखी
भक्तों का उमड़ता सैलाब देखा
पुण्य स्नान फलने का लाभ देखा…
हाथों में कलावे की डोरी देखी
चेहरे पर तिलक की मोली देखी
गले में रुद्राक्ष की माला देखी
नजरों में धर्म की पाठशाला देखी…
नभ देखा, चांद देखा, तारे देखे
मेला क्षेत्र में उतरते सितारे देखे
मन की हर चाह फलीभूत होते देखी
नागा साधुओं की दिव्य भभूत देखी…
संन्यासी जीवन की महिमा देखी
माता और बहनों की गरिमा देखी
कठोर साधना का परम प्रताप देखा
फिर से मिलने का विश्वास देखा…
– अमित बैजनाथ गर्ग