🪼 *ओ३म्* 🪼
📚 ईश्वरीय वाणी वेद 📚
*ओ३म् उद्वयं तमसस्परि स्व: पश्यन्त उत्तरम्।देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्।।*
।। अथर्ववेद ७/५३/७।।
🖋️ *मंत्रार्थ*🖋️
🥝 वयं = हम लोगों ने 🥝 तमस: = पाप या अंधकार से 🥝 परि = ऊपर उठकर 🥝 स्व: पश्यंत= ज्योति: दृष्टवंत: प्रकाश को देखा और 🥝 देवं सूर्य्यम् = परम प्रकाशक ईश्वर को 🥝 उद् +अगन्म = पा लिया। 🥝 उत्तरम् = आगे बढ़कर देखा तो 🥝उत्तरं ज्योति : = अधिक तेज वाले प्रकाश को पाया और आगे बढ़े तो 🥝 देवत्रा = हर प्रकाशक वस्तु में व्यापक 🥝 उत्तमम् ज्योति: = सर्वोत्कृष्ट ज्योति अर्थात् परम- प्रभु की प्राप्ति हुई।
👁️ *मंत्र की मीमांसा*👁️
सर्वसाधारण मनुष्य का जीवन *अंधकार या पापों* से आच्छादित रहता है। खाने पीने और संसार के बखेड़ों में लिप्त मनुष्य कै परमात्म तत्व के दर्शन नहीं होते। क्योंकि हमको रोटी तो दिखाई देती है मगर रोटी में *व्यापक ईश्वर* नहीं दीखता। पानी दीखता है मगर पानी में व्यापक ईश्वर नहीं दीखता यदि दीखता तो क्या देश की राजधानी में। *जल-घोटाला* होता ? परमात्मा की सम्पत्ति पर *छद्म राजनीति* होती ? नास्तिकों की इससे बड़ी पहचान क्या हो सकती है कि जो ईश्वर की सृष्टि पर अपना कानून चलाते हैं। ऐसे ही लोग कहते हैं अगर *ईश्वर है तो दिखाओ* ?
ईश्वरीय वाणी वेद कहती है कि सत्य को जानने के लिए आपको *तमस:परि* पापों से ऊपर उठकर देखना होगा। पापों से उठने का क्रमिक विकास आठ प्रकार का है। *यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि* । मगर बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि धर्म के ठेकेदारों ने *योग को योगा* कहकर और *श्वसन क्रियाओं को प्राणायाम तथा उठक-बैठक* को ही योग समझ लिया है। महर्षि पतंजलि का योग दर्शन आज। *वैश्विक बाजार* बनाकर रख दिया है। जब तक *यम-नियम* की उपेक्षा होगी तब तक पापों से ऊपर उठना असंभव है।
लोग *हिंसा और असत्य* से उठना ही नहीं चाहते तो फिर उनको *सूर्य्य उदगन्म* यानि ईश्वर प्रकाश की झलकी कैसे मिले ? सूर्य का अभाव नहीं है, हमारे सिर पर न चमके न सही, दूसरों के सिर पर तो चमकता है।
बाईबल की मूल भाषा *अरमाईक* है क्योंकि ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं जानते थे। अंग्रेज़ी में उसका अनुवाद किया गया है। अंग्रेजी बाईबल में एक शब्द आता है *My Father in Heaven* इसका अनुवाद हुआ कि 🧘 मेरा बाप स्वर्ग 🧘 में है। स्वर्ग के लिए *हैविन* कहा गया है। अतः लोगों ने समझा कि यह जो उपर उठा हुआ *नीला आकाश* है यही *हैविन*है और हमारे परमपिता परमात्मा उसी। *हैविन* में रहते हैं। और थाली का वैगन हिंदू भी यही कहता है कि *सब ऊपर वाले की दया* है। आश्चर्य इस बात का है कि वेद तो छोड़ दीजिए *रामायण, गीता, महाभारत,सत्य नारायण कथा, हनुमान चालीसा आदि किसी हिंदू किताब में नहीं लिखा है कि ईश्वर ऊपर है।हर जगह यही लिखा है कि *ईश्वर सर्वव्यापक* है। सत्यता यही है कि हमने ईश्वरीय वाणी वेद को देखा ही नहीं। वेदमाता कहती है ईश्वर को देखना है तो * *पापों से ऊपर उठो* मगर ईसाई, मुसलमानों ने समझा खुदा ऊपर है और इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने। *सातवें व चोथे आसमान*। की बात कही हिंदुओं ने सत्य बचन महाराज कहकर ऊपर से समझौता कर लिया। जबकि सत्यता यह है कि 🏵️ अष्टांग योग 🏵️ में ही ये दोनों आसमान हैं मगर अति महत्वपूर्ण हैं।चौथा आसमान का मतलब योग का चौथा चरण *प्राणायाम* और सातवां आसमान मतलब योग का सातवां आसमान *ध्यान* । आधुनिक *मार्डन योगी* भी योग के नाम पर इतना ही कराकर अपने आपको *योगी* घोषित कर रहे हैं।इसको भी विकृत कर रहे हैं। क्योंकि *भस्त्रिका, कपालभाति, अनुलोम विलोम प्राणायाम नहीं है केवल श्वसन क्रियाएं* मात्र हैं। फिर हाल वेदमाता कहती हैं कि जो भी वेदानुकूल इन आठ अंगों के अनुसार जीवन जीयेगा वो पापों से ऊपर उठकर आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त होगा।
आचार्य सुरेश जोशी
🍁 वैदिक प्रवक्ता 🍁