अगन लगाए तन मन में

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वासंती पुरवाई बैरन,अगन लगाए तन मन में।

बीते कैसे रैना मेरी,करवट बदलूँ तड़पन में।।

 

फूल खिले सरसों के छायी,यहां बसंत बहार पिया।

मैं कहती हूँ प्यार तुम्हारा,ही मेरा संसार पिया।।

कैसे खेलूंँ फाग तुम्हारे,बिना सजनवा जीवन में..

वासंती पुरवाई बैरन,अगन लगाए तन मन में।।

 

बिना तुम्हारे आंँगन सूना,काटे कटे नहीं रैना।

आकर मुझको धीर बँधाओ,तरस रहे पागल नैना।।

खेलूंँ कैसे अबकी होली,तुम्हें खोजती उपवन में..

वासंती पुरवाई बैरन,अगन लगाए तन मन में।।

 

लगे सुहाना मौसम प्यारा,याद तुम्हारी आती है।

एक अजब सी तड़प रात भर,रहती मुझे जगाती है।

 

भरो अंक में ले लो मुझको,प्रियतम अपने बंधन में..

वासंती पुरवाई बैरन,अगन लगाए तन मन में।।

 

रंग भरा शृंगार किए मैं,पिया खड़ी हूंँ द्वारे जी।

आकर गले लगा लो मुझको,प्यारे सजन हमारे जी।।

प्रीति लिए मैं तुम्हें मिलूँगी,हर पल पिया समर्पण में..

वासंती पुरवाई बैरन,अगन लगाए तन मन में।।

 

अंजना सिन्हा “सखी”

रायगढ़

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