जिस को देखो दौलत का आदमी पुजारी है- जर्रार तिलहरी

ग़ज़ल 

जानता हूँ उसके घर शून्य बे शुमारी है
जानिबे क़ज़ा फिर भी मुझ में होशियारी है

ख़ाक मरके भी होना सब को बारी बारी है
क्यारियों में भी जारी ख़ूब आबयारी है

आज कल की दुनिया भी कितनी यार न्यारी है
जिस को देखो दौलत का आदमी पुजारी है

ये नतीजा तो सारा मेहनतों का है लोगों
इक अमीर और भाई दूसरा भिकारी है

ज़र्फ़ अपना अपना और अपनी अपनी है बाज़ी
मेरी नज़रों से देखो हर कोई जुआरी है

वक़्त के तक़ाज़े का अहतराम क्या करना
आ तुझे बताता हूँ कौन किस पे भारी है

ऐसे वैसे लोगों को मन्ज़िलें मयस्सर हैं
अपनी ज़िन्दगी में ही सिर्फ़ इन्तेज़ारी है

जर्रार तिलहरी

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