मजदूर दिवस

मजदूर दिवस

मिट्टी से उठकर सपने बुनता है

पसीने से रोज़ रोटी वह चुनता

धूप में जलकर भी मुस्कुराता रहता

थककर भी जीवन को आगे बढ़ाता

ईंटों के बीच उम्मीदें सजाता रहता

टूटी चप्पल में भी राह निभाता

भूख छुपाकर बच्चों को हँसाता है

आँखों में अपने कल को बसाता

शहर बनाता पर खुद झोपड़ी पाता

दर्द दबाकर गीत नए गुनगुनाता

कंधों पर बोझ मगर दिल हल्का

हर दिन खुद को फिर से उठाता

सपनों का घर दूसरों के लिए बनाता

अपना घर बस सोच में रह जाता

मेहनत उसकी कभी व्यर्थ नहीं जाती

पर किस्मत अक्सर उससे दूर भागती

फिर भी हौसलों की लौ जलाता

जीवन को हर रोज़ नया बनाता

मजदूर है वह धरती का सच्चा वीर

चुपचाप संघर्ष में लिखता तकदीर

 

स्वरचित/ मौलिक

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़