ग़ज़ल
बस मश्वरे की तेरी सौग़ात जरूरी थी,
करनी थी मुझे तुझ से जो बात जरूरी थी।
क्या कुछ नही होता है अब दिन के उजाले में,
फिर काम था क्या ऐसा जो रात जरूरी थी।
मैं हंस के लुटा देता जो खुल के माँगते तुम,
दौलत के लिए भाई से घात जरूरी थी।
छप्पर पे तरस खा कर बादल तो नहीं बरसे,
खेतों के लिये लेकिन बरसात जरूरी थी।
जब खेलने बैठे हो कोठी के मुसाहिब,तब,
हम जैसों की समझ लो फिर मात जरूरी थी।
अपनों में पहुँच कर के दुख दर्द सुनाते तुम,
कोठी की,हवेली की,खैरात जरूरी थी।
समझौता जो करना था बाशिन्द-ए-कूफा को,
इतने बड़े लश्कर की बारात जरूरी थी।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥