जंगल चुप नहीं, भीतर गाता है।

काव्य: जंगल

 

जंगल चुप नहीं, भीतर गाता है।

हर पत्ता कोई राज सुनाता है।

हवा लिखती हरियाली का गीत,

धरती ओढ़े सपनों की प्रीत।

छाँव यहाँ सूरज को थामे,

नदियाँ खुद अपनी राहें थामे।

चिड़ियों की बोली में संसार,

गूँज उठे हर कोना अपार।

पेड़ों की जड़ें गहरी कथा,

समय सुनाता जीवन की व्यथा।

शाखों में उम्मीदें झूलतीं,

खामोशी में बातें फूलतीं।

यहाँ नहीं कोई झूठा शोर,

सच की धुन बस चारों ओर।

हर कण में जीवन की आस,

हर सांस में प्रकृति का विश्वास।

जंगल सिर्फ पेड़ों का घर नहीं,

ये धड़कता दिल है, पत्थर नहीं।

जो समझे इसकी मौन ज़ुबान,

वही जान पाए इसका मान।

 

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर, राजिम

छत्तीसगढ़