माँ कात्यायनी वंदना – अद्वितीय काव्य 

माँ कात्यायनी वंदना – अद्वितीय काव्य

 

स्वर्ण प्रभा सी ज्योति लिए, सिंहासन पर विराजी हो,

ऋषि कात्यायन की तपस्या से, धरती पर तुम आई हो।

कर में कमल, कर में तलवार, रूप अनोखा धारण किया,

अधर्म मिटाने को माता, तुमने रण का वरण किया।

तेरी आँखों में तेज अपार, जैसे सूरज की ज्वाला हो,

तेरी मुस्कान में करुणा, जैसे गंगा की धारा हो।

भक्तों की हर पीड़ा हरती, संकट हर लेती हो माँ,

अंधकार में दीप बनकर, जीवन भर देती हो माँ।

महिषासुर का अंत कर, धर्म ध्वजा फहराई थी,

तेरी शक्ति के आगे, हर बाधा भी घबराई थी।

कन्या रूप में पूजी जाती, नवदुर्गा का मान हो,

सृष्टि की हर नारी में, तेरा ही सम्मान हो।

मन की इच्छा पूर्ण करो, ऐसी कृपा बरसाओ माँ,

भटके पथिक को सही राह, स्नेह से दिखलाओ माँ।

तेरे चरणों की धूल से, जीवन मेरा संवर जाए,

तेरे नाम का दीप जले, हर अंधियारा डर जाए।

जय कात्यायनी अम्बे, जय शक्ति अपार तुम्हारी,

तेरे चरणों में नमन मेरा, जगत जननी तुम न्यारी।

 

स्वरचित मौलिक

राजलक्ष्मी श्रीवास्तव

जगदलपुर राजिम

छत्तीसगढ़