महेन्द्र कुमार उपाध्याय
अयोध्या। चैत्र नवरात्रि एवं रामनवमी महोत्सव के पावन अवसर पर अयोध्या की प्रसिद्ध पीठ अशर्फी भवन में विराजमान सपरिकर श्री लक्ष्मीनारायण भगवान का 80वां प्रतिष्ठा महोत्सव एवं ब्रह्मोत्सव अत्यंत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस भव्य आयोजन में दक्षिण भारत से पधारे विद्वानों ने वैदिक रीति-रिवाजों के साथ विविध अनुष्ठान संपन्न कराए।
दिव्य महाअभिषेक और पूजन
महोत्सव का मुख्य आकर्षण भगवान का दिव्य महाअभिषेक रहा। पूज्य जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी श्री धराचार्य जी महाराज के यजमानत्व में दाक्षिणात्य विद्वानों द्वारा सर्वप्रथम भगवान विश्वकसेन का विशेष पूजन व अर्चन किया गया। इसके पश्चात 111 रजत कलशों से सरयू जल, गौ दुग्ध, दही, घी, शहद (पंचामृत), सर्व औषधि जल तथा सुगंधित इत्र व फलों के रसों से भगवान का महाअभिषेक किया गया।
मध्याह्न काल में भगवान की मनमोहक फूल बंगला झांकी सजाई गई। तुलसी दल और पुष्पों के साथ 1008 अर्चना (सहस्रनामावली) का पाठ किया गया। महाराज जी का संदेश: “यज्ञ और अभिषेक से होती है आत्मशुद्धि” इस अवसर पर भक्तों को संबोधित करते हुए जगद्गुरु स्वामी श्री धराचार्य जी महाराज ने अभिषेक और भगवत आराधना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा:
“यज्ञ साक्षात भगवान का स्वरूप है। प्रभु का अभिषेक करने से न केवल आत्मशुद्धि होती है, बल्कि पर्यावरण की भी शुद्धि होती है। हम सभी जीव उस परमात्मा के अंश हैं और वे हमारे अंशी हैं। अतः प्रत्येक जीव को सदैव भगवान के स्मरण और चिंतन में लीन रहना चाहिए।”
भंडारा एवं भक्तों का उत्साह
अनुष्ठान की पूर्णता के पश्चात विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। दक्षिण भारतीय पद्धति से हुए इन अनुष्ठानों और भगवान के दिव्य विग्रह के दर्शन कर भक्तगण भावविभोर हो उठे। पूरे परिसर में ‘जय श्रीमन नारायण’ की गूँज बनी रही।