ग़ज़ल
लब पे मेरे देख ले तू ज़ुर्रत-ए-इंकार है,
फ़ैसला अब तू करेगा क्यों कि तू सरदार है।
हाथ फैलाये हुए जब सब खड़े हों सामने,
फ़ैसला कैसे हो इनमे कौन फिर हक़दार है।
मुंह पे ताला डाल कर बैठे हैं सारे इस तरह,
जैसे ये संसद नहीं अकबर का ये दरबार है।
मुल्क में ओहदा हो उसका चाहे जितना भी बड़ा,
अपनी मिट्टी से दग़ा करता है जो ग़द्दार है।
अम्न का पैग़ाम पश्चिम से जो देता है हमें,
पास उसके देख लो लाशों का कारोबार है।
फ़ैसला ग़ाज़ा के हक़ में आयेगा क्यूँ कर नहीं,
बच्चा बच्चा क़ौम का लड़ने को जब तैय्यार है।
अब तो ये तस्लीम करने लग गये सारे नदीम,
लाख कमियाँ ही सही बंदा मग़र दमदार है।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥