उन्मुक्त उड़ान मंच पर रंगोत्सव काव्य गोष्ठी
उन्मुक्त उड़ान मंच – आपका अपना साहित्यिक मंच – द्वारा रंगोत्सव सप्ताह के द्वितीय आयोजन के अंतर्गत दिनांक 4 मार्च 2026, बुधवार को सायं 6:00 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक गूगल मीट के माध्यम से एक आभासी काव्य गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। इस अवसर पर मंच से जुड़े रचनाकारों ने अपने शब्दों की पिचकारी से भावों के रंग बिखेरते हुए श्रोताओं को रससिक्त कर दिया। होलिकोत्सव के उल्लासमय वातावरण में होली गीतों की ऐसी महफिल सजी कि सभी प्रतिभागी आनंद में सराबोर हो उठे।
इस काव्य गोष्ठी का आयोजन मंच की संस्थापिका, संयोजिका एवं अध्यक्षा डॉ. दवीना अमर ठकराल “देविका” के मार्गदर्शन में हुआ तथा संचालन विशेष शर्मा “सुहासिनी” ने अत्यंत प्रभावपूर्ण, सराहनीय और सुव्यवस्थित ढंग से किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंच की संस्थापिका के स्वागत वक्तव्य तथा गोष्ठी के औचित्य पर उनके विचारों से हुआ। इसके पश्चात अमिता गुप्ता “नव्या/सुरभि” ने अपने सुमधुर कंठ से सरस्वती वंदना प्रस्तुत की—
मातु वागेश्वरी हे! वीणावादिनी,
माँ मेरी शारदे, माँ हमें तार दे।
नीरजा शर्मा ‘अवनि’ ने अपनी रचना के माध्यम से संदेश दिया कि होली को हुड़दंग नहीं, बल्कि प्रेम और सौहार्द का पर्व बनाना चाहिए—
हुड़दंगबाजी को होली का मकसद न बनाओ,
प्यार से खेलो और गिले-शिकवे भूल जाओ।
संचालिका विशेष शर्मा “सुहासिनी” ने अलंकारिक शैली में कहा
आओ इस बार पिचकारी में
सिर्फ रंग ही नहीं, थोड़ा-सा अपनापन और ढेर सारा प्रेम भी भर लें,
ताकि जब संध्या ढले और चेहरों से रंग उतर भी जाएँ,
मन पर चढ़ा स्नेह का रंग कभी फीका न पड़े
यही सच्ची होली है।
अरुण ठाकर “कवित्त” ने प्रेम और फाल्गुनी रंगों का सुंदर चित्र खींचा
इश्क़ का रंग ऐसा निखरा, भीगे सजनी-साजन यार,
फाल्गुन के रंग सारे निखरे, भीगे तन-मन यार अपार।
शिखा खुराना “कुमुदिनी” ने प्रिय के रंग में रंग जाने की भावपूर्ण अभिलाषा व्यक्त की
अब के बरस न बरसाना रंग,
तोरे रंग में रंगना चाहूँ तन-मन।
डॉ. अनीता राजपाल ‘अनु’ वसुन्धरा ने होली के माध्यम से वैरभाव मिटाने का संदेश दिया
खेलें वैरभाव भुला, अबोलों को भी लें बुला,
भाईचारा बढ़ाने को, एकजुट होइए।
रेखा पुरोहित ‘तरंगिणी’ ने पौराणिक प्रसंग को काव्य रूप में प्रस्तुत किया—
असुर कुल में जन्म लिया, बालक नाम प्रह्लाद,
विष्णु भक्त वह बड़ा अटल, था राक्षस घर अपवाद।
सुरेशचन्द्र जोशी ‘सहयोगी’ ने हास्य के रंग घोलते हुए श्रोताओं को खूब गुदगुदाया
अब के साजन इस होली में रंग नए कुछ कम ही लाना,
साली तो अब कहाँ मिल रही, पत्नी को ही रंग लगाना।
अशोक दोशी’दिवाकर’ने बेहतरीन लोक गीत गाकर समा बाँध दिया। गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं
कान्हा खेले होरी, राधा जी के संग।
आये वो चोरी चोरी ,डारे उन पर रंग ।
डॉ. फूलचंद्र विश्वकर्मा “भास्कर” ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रचलित फाग गीत के माध्यम से कृष्ण-राधा की होली का मनमोहक वर्णन प्रस्तुत किया
तुम कहाँ छिपी हो बृजबाला,
बाहर से तुम भोली-भाली, भीतर भरा ज़हर प्याला।
किरण भाटिया “नलिनी” ने एकता और प्रेम का संदेश दिया—
भेदभाव नफ़रत को भुलाकर, एकता का भाव जगाकर,
प्रेम का रंग है कितना प्यारा, एक बार तो देखें आज़माकर।
एकता गुप्ता “काव्या महक” ने जोगीरा शैली में प्रस्तुति दी—
श्याम सलोने मोहन प्यारे, मचा रहे हुड़दंग,
आज नहीं छोड़ेंगे राधे, बिना लगाए रंग।
जोगीरा सारा रा रा…
डॉ. पूनम सिंह “सारंगी” ने मन के मैल को मिटाकर सौहार्द बढ़ाने का संदेश दिया—
होली आ गई है, सब गले लग जाना,
मिटाना मन-मैल, सौहार्द्रता फैलाना।
रंजीता भारती श्री ने रंगों के साथ रिश्तों की मिठास का सुंदर भाव प्रस्तुत किया
होली के आगमन पर रंगों की बात न हो,
और जहाँ रिश्तों में दूरी हो, वहाँ मिठास न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता।
अंत में डॉ. दवीना अमर ठकराल “देविका” ने अपनी रचना के माध्यम से होली का सार प्रस्तुत किया—
अहंकार की राख उड़ा दें फागुन की बयार में,
स्नेह-सुगंध महके हर आँगन हर द्वार में,
मिलकर गाएँ सद्भाव के सुर मधुरिम तान,
होली का संदेश बने मानवता की पहचान।
समापन उद्बोधन में उन्होंने कहा कि जब भीतर की नकारात्मकता सकारात्मकता में रूपांतरित होने लगती है, तभी जीवन में रंगों का वास्तविक उत्सव प्रारंभ होता है। अंतर्मन की शुद्धि ही सच्चा उत्सव है, जहाँ भीतर का परिवर्तन जीवन को आनंद के रंगों से भर देता है और हर पल होली बन जाता है।
इसी मंगल भावना के साथ उन्होंने उपस्थित सभी रचनाकारों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुए सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ दीं तथा शीघ्र ही आगामी साहित्यिक आयोजन आयोजित करने का आश्वासन भी दिया