ग़ज़ल
लाख दूँ उसको मैं आवाज़,वो आने से रहा,
और ख़ुद मुझ को वो कमबख़्त बुलाने से रहा।
ज़ख़्म पर मान मनुव्वल का असर कुछ भी नहीं,
दर्द ऐसा है कि कम्बख़्त ये जाने से रहा।
मुझी को जा के मिलना पड़ेगा हाथ उस से,
अब मेरी सम्त तो वो हाथ बढ़ाने से रहा।
सर क़लम कर दे हवेली मुझे मंजूर है ये,
सर मगर जा के वहाँ मैं तो झुकाने से रहा।
प्यार के ये नये दस्तूर मुबारक हो तुम्हें,
बोझ बन जाये जो रिश्ता वो निभाने से रहा।
अब तो रुसवाइयां दहलीज़ तलक आ पहुचीं,
अब तो घर वालों को मुंह अपना दिखाने से रहा।
ऐ नदीम अपनी नहर साथ सदा ले के चलो,
अब तुम्हारी तो कोई प्यास बुझाने से रहा।
नदीम अब्बासी “नदीम”
गोरखपुर॥