अनुभव की संपदा

विषय-अनुभव की संपदा

 

न चमक में है ये दौलत, न ये चेहरे के नूर में,

सच्ची महक बसी होती है, जीवन के दस्तूर में।

जो समय की भट्टी में तपकर, कुंदन बनकर निखरता है,

वही अनुभव का सच्चा धन, इंसान के भीतर उतरता है।

थपेड़े वक़्त के जितने भी, इस संपदा को आएँगे,

चोर चुरा न सकेंगे इसे, ये और भी चमक जाएँगे।

धूप ने दी जलने की शक्ति, छाँव ने शीतल किया मन,

ठोकरों के पत्थरों से ही, सँवर गया जीवन का उपवन।

हार की राख को समेटा, तो जीत का सूरज उगा,

कच्चे लोहे सा था जीवन, जो तजुर्बों में गला।

किताबों के पन्नों से ज्यादा, गलियों ने सबक सिखाया,

काँटों की चुभन ने ही तो, फूलों का मोल बताया।

सफेद बाल उम्र नहीं, संचित ज्ञान का उपहार हैं,

उड़ान अगर नया जोश है, तो अनुभव गहरा आधार है।

बाँटने से ये बढ़ती जाए, घटने का कोई डर नहीं,

तजुर्बों के धनी से ऊँचा, दुनिया में कोई सर नहीं।

 

ज्योती वर्णवाल

नवादा (बिहार)